Home Education बच्चे को शिक्षा के साथ ही संस्कार देना है जरूरी

बच्चे को शिक्षा के साथ ही संस्कार देना है जरूरी

वर्तमान समय में यह महसूस किया जा रहा है कि जैसे-जैसे शिक्षित नागरिकों का प्रतिशत बढ़ रहा है, वैसे-वैसे समाज के संस्कारों में गिरावट आ रही है. हमें संस्कारों का सौंदर्य बोध होना चाहिए और बच्चे को भी इसका जानकारी देनी चाहिए.

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हर बच्चे के लिए शिक्षा और संस्कार दो बेहद जरूरी विषय है. हर माता-पिता यह चाहते हैं कि उनका बच्चा शिक्षित व संस्कारी बनें क्योंकि संस्कार ही हमारी पहचान हैं और संस्कार ही हमें अपनों के करीब रखता है. कहा जाता है कि शिक्षा जीवन का उपहार है और संस्कार जीवन का सार. या फिर यूं कहें कि शिक्षा व संस्कार (children education rites) दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं यानी एक के बिना दूसरा अधूरा है. अगर किसी ने बहुत शिक्षा हासिल किया और शिक्षा के बल पर उसने देश-दुनिया में काफी नाम भी कमाया लेकिन अगर उसमें संस्कारों की कमी है तो फिर वह शिक्षा किसी काम की नहीं!

एक बेहतर इंसान बनने के लिए शिक्षा के साथ-साथ संस्कार का भी होना बेहद जरूरी है।

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हालांकि आज कल तो संस्कार की परिभाषा ही बदल रही है. आधुनिकता के इस युग में अधिकांश माता-पिता इतने व्यस्त हो गए हैं कि उनके पास बच्चों के साथ वक्त बिताने का समय नहीं है और अगर है भी तो वे इसे गंभीरता से नहीं लेते और यही वजह है कि बच्चे में संस्कार की कमी होती है.

परिवार ही बच्चे की पहली पाठशाला है और माता-पिता बच्चे के शिक्षक हैं. बच्चे ही देश के भविष्य हैं और इन्हीं पर हमारे देश व समाज का विकास टिका है. अच्छे संस्कारों से ही शिक्षा पल्लवित होगी. वर्तमान समय में यह महसूस किया जा रहा है कि जैसे-जैसे शिक्षित नागरिकों का प्रतिशत बढ़ रहा है, वैसे-वैसे समाज के संस्कारों में गिरावट आ रही है. हमें संस्कारों का सौंदर्य बोध होना चाहिए और बच्चे को भी इसकी जानकारी देनी चाहिए.

विद्यार्थी जो देश का भविष्य हैं वे तनाव, अवसाद, बाहय आकर्षण और अनुशासनहीनता के शिकार हैं. इसका कारण पाश्चात्य संस्कृति, विद्यालय या समाज ही नहीं, बल्कि संस्कारों के प्रति हमारी उदासीनता है. अत: परिवार में प्रत्येक सदस्य का दायित्व है कि बच्चों में भौतिक संसाधनों के स्थान पर संस्कारों की सौगात दें.

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बच्चे को संस्कारी बनाने की पहली सीढ़ी घर है और उनमें यहीं से संस्कार डाला जा सकता है अन्यथा बड़े होने पर इसकी कोई गुंजाइश नहीं रहती. सबसे जरूरी है कि अपने बच्चे को सुबह उठकर घर के बड़े सदस्यों को पैर छूने की आदत डालें और संस्कार की शुरुआत यहीं से होती है. अगर घर में आपसे बड़ा कोई सदस्य है तो आप स्वयं पर भी इस नियम को लागू करें क्योंकि प्रैक्टिकल ज्ञान अधिक प्रभावी होता है चाहे वो बच्चे पर हो या बड़े पर और यह मानना सही है कि देखी हुई चीजें हमेशा याद रहती है. तो इसे अपनाने में तनिक भी देरी ना करें.

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सुबह उठकर घर के सदस्यों को मुस्कान भरे चेहरे के साथ गुड मार्निंग बोलना बेहद खास होता है. अगर आप सुबह के वक्त किसी को मुस्कुराते हुए गुड मॉर्निंग बोलते हैं और सामने से भी अगर उसी अंदाज में इसका जवाब मिलता है तो पूरा दिन मन खुश और ऊर्जावान रहता है. घर से सीखी हुई इस आदत को बच्चे घर के बाहर भी व्यवहार करते हैं तो लोगों पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ता है.

वह माता-पिता शत्रु के समान हैं जिन्होंने अपने बच्चे को संस्कारों की शिक्षा नहीं दी. समाज की वर्तमान परिस्थिति ऐसी है कि बच्चे का लगाव सिर्फ अपने माता-पिता तक ही सीमित रह गया है. उसके आगे-पीछे वे किसी और को नहीं पहचानते यहां तक की अपने दादा-दादी के साथ भी उनका लगाव नहीं रहता है. एकमात्र अभिभावक की कमजोरी और संस्कारों में कमी के कारण ही बच्चे ऐसे होते हैं. अभिभावक का फर्ज बनता है कि वो बच्चे में शुरुआती दौर से ही ऐसे संस्कार दें जिससे उनमें दादा-दादी के प्रति भी अपनापन का भाव रहे.

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संस्कारों में कमी का ही नतीजा है कि समाज में एकल परिवारों की संख्या बढ़ रही है और संयुक्त परिवारों का चलन कम हो रहा है. बच्चे अपने दादा-दादी, चाचा-चाची व भाई-बहन तक को भी पराया मानने लगे हैं. हालांकि एक स्वस्थ समाज के लिए बच्चे का ऐसा व्यवहार बिल्कुल भी जायज नहीं है. एक अभिभावक होने के नाते आपका फर्ज बनता है कि आप रोजाना अपने बच्चे को कम से कम एक घंटा दें, जिसमें उसे संस्कारों के बारे में बताएं. उन्हें यह बताएं कि किस तरह हमें सिर्फ घर में ही नहीं बल्कि बाहर भी लोगों के साथ अच्छा व्यवहार रखें.

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संस्कार तो पूर्वजों की पूंजी होती है और यही बच्चे की पहचान भी. अगर हमारे संस्कार अच्छे हैं तो हमारी पहचान अच्छे व्यक्तित्व के तौर पर बनती है और संस्कार बुरे हैं तो बुरी पहचान बनती है. पूर्वजों के संस्कार को कायम रखने की जिम्मेवारी अभिभावक की है. बच्चे को समय-समय पर अपने पूर्वजों के संस्कारों से अवगत कराते रहें क्योंकि समाज में बिगड़ने, भटकने के साधन बढ़ते जा रहे हैं और धार्मिक संस्कारों के साधन घटते जा रहे हैं.

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यह भी विचार करने वाली बात है. अगर बच्चा कोई गलती करे तो शुरुआती दौर से ही उस पर शासन होनी चाहिए. ना कि लापरवाह की तरह उसे छोड़ दें अन्यथा बच्चे के अंदर से आपके प्रति भय खत्म हो जाएगा. जब वह आपसे डरेगा नहीं तो फिर वो आपके बताए रास्ते पर चलेगा नहीं और कुछ सीखेगा भी नहीं. तो फिर ऐसे बच्चे को संस्कारहीन बोला जाता है. ऐसे बच्चे ही आगे चलकर समाज को दूषित करते हैं. ऐसे में बेहतर है शुरुआती दौर से ही बच्चे पर विशेष निगरानी रखते हुए उसे संस्कारी बनाया जाए!

घर के बाद स्कूल वह प्लैटफॉर्म है जहां बच्चा संस्कारों की शिक्षा लेता है. स्कूल के शिक्षकों एवं शिक्षिकाओं की जिम्मेदारी होती है, जो बच्चों को अच्छे संस्कारों का बोध कराते हैं. हमारे संस्कार अच्छे हैं और हमें अच्छे या खराब की जानकारी नहीं है, तो इसका महत्व नहीं रहता. लिहाजा, संस्कारों का ज्ञान और उनकी सुन्दरता ही हमें उन्नति के लिए प्रेरित करती है. यदि संस्कारों की एक कड़ी शुरू हो जाती है तो फिर इसमें निरंतरता बनी रहती है और यही अच्छा समाज बनाने सहायक होती है.

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