Home Education बच्चों के लिए मातृभाषा का ज्ञान होना बेहद जरूरी!

बच्चों के लिए मातृभाषा का ज्ञान होना बेहद जरूरी!

वैश्वीकरण के इस दौर में अंग्रेजी ही क्यों अन्य भाषाएं सीखना भी जरूरी है. लेकिन इससे ज्यादा जरूरी है पहले अपनी मातृभाषा का सम्मान करते हुए इसकी अच्छी जानकारी हासिल करना. मातृभाषा ही आपकी व देश की संस्कृति की पहचान होती है.

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मातृभाषा (Mother Language) किसी इंसान की सामाजिक व भाषायी पहचान है. अपनी भाषा ही आपको राष्ट्रीयता से जोड़ती है. मातृभाषा ही हमारे संस्कारों की संवाहक है.

इसके बिना किसी देश की संस्कृति की कल्पना भी नहीं की जा सकती. अपनी भाषा पर हर किसी को गर्व होना चाहिए. भाषा ही अपनी पहचान है. लेकिन हां, यह भी नहीं कि अपनी भाषा पर तो हम गर्व करें, पर इसके विपरीत किसी विदेशी भाषा का विरोध किया जाए. आज वैश्वीकरण का दौर है. भिन्न संस्कृतियों में काम करने के लिए हर व्यक्ति के पास अन्य भाषा का ज्ञान रहना भी बहुत जरूरी है. आज विश्व में लगभग 7 हजार भाषाएं हैं. सामाजिकता और क्षेत्रियता के हिसाब से भाषाओं के बीच रिश्ता बनता है. संसार में रहते हुए हम रचना भी करते हैं और खुद भी रचे-बुने जाते हैं. इन तमाम पद्धतियों की शुरुआत बचपन से होती है.

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आप भी अपने बच्चे को मातृभाषा से जुड़ी जानकारियां साझा करें. तभी तो उनमें अपनी भाषा के प्रति रुचि बढ़ेगी.

भाषा बच्चे में जन्म से ही एक अनुभव के रूप में प्राप्त होती है. उसे शुरुआत के दिनों से ही घर पर माता-पिता के माध्यम से मातृभाषा (Mother Language) का ज्ञान होना शुरू हो जाता है. भाषा के इस पहले अनुभव की बच्चे के मस्तिष्क पर गहरी छाप पड़ती है. मातृभाषा का ज्ञान सबके लिए जरूरी है. इसलिए अभिभावक को बचपन से ही बच्चे को मातृभाषा का ज्ञान देना चाहिए. कहा यह भी जाता है कि अपनी भाषा बच्चे के मस्तिष्क को जरूरी पोषण भी देता है.

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मनुष्य जीवन के शुरुआती 7 वर्ष भाषा सीखने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. अध्ययन में बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा के लिए इसी भाषा को सबसे सटीक माना गया है. मातृभाषा की शिक्षा ग्रहण करना हर किसी के लिए अनिवार्य होना चाहिए. मातृभाषा (Mother Language) का बेहतर ज्ञान हो जाने के बाद आपके बच्चे में भाषा व्यवहार करने का एक सांचा तैयार हो जाता है. इससे बच्चे को अन्य भाषा सीखने में काफी आसानी होती है. अगर माता-पिता हिंदी भाषा भाषी रहते हैं और बच्चे अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ाई करते हैं, तो अभिभावकों के लिए पढ़ाई में बच्चे की मदद करना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में कई बार देखा जाता है कि बच्चे उक्त स्कूल में टिक नहीं पाते. अगर टिक भी गए तो उनका ज्ञान लगभग सीमित रह जाता है.

अंग्रेजी के लिए अपनी भाषा को नकारना है गलत

भारत में लोगों का अंग्रेजी के प्रति लगाव काफी हो गया है. जिसकी वजह से मातृभाषा पिछड़ती जा रही है. मान-सम्मान और प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखा जाए तो आज हिंदी व अंग्रेजी भाषा के बीच खाई पैदा हो गई है. अंग्रेजी को ही सर्वस्व माना जा रहा है. अंग्रेजी से बढ़ते लगाव की वजह से आज के युवा हिंदी से दूर होते जा रहे हैं. अपनी मातृभाषा के प्रति उनके अंदर जो संस्कार होने चाहिए वह कम होता जा रहा है. अपनी भाषा में वे बहुत ज्यादा कमजोर होते जा रहे हैं. बच्चों को अगर मातृभाषा (Mother Language) में पढ़ाया जाए तो उनके नतीजे बेहतर होते हैं. इसलिए ध्यान रहे कि अंग्रेजी सीखने के चक्कर में अपनी भाषा को नकारना बिल्कुल गलत है.

language day
source: nationmultimedia

भाषा संबंधी कुछ जरूरी बातें:

1. भाषा के साथ भावनात्मक लगावः

भाषा हर किसी के सामाजिक जीवन से जुड़ी होती है. भाषा में हम सबके विचारों की अभिव्यक्ति को सशक्त बनाने की ताकत है. यह एक भावनात्मक मुद्दा है. यह वह कड़ी जो इंसान को उसकी पहचान दिलाती है. कोई व्यक्ति अपनी भावनाओं को जितने बेहतर तरीके से अपनी भाषा में समझा सकता है. उतने बेहतर तरीके से अन्य भाषा में समझाना उसके लिए काफी मुश्किल होता है.

मातृभाषा हमारी ताकत है. लेकिन इसे संजोकर रखना भी तो जरूरी है. पिछले कई वर्षों से एक-एक कर दुनिया की कोई न कोई भाषा दम तोड़ती जा रही है. इसकी वजह से ही 16 मई 2007 को संयुक्त राष्ट्र महासभा की तरफ से एक संकल्प पारित किया गया था. जिसमें दुनिया भर के लोगों द्वारा व्यवहार की जाने वाली भाषाओं के संरक्षण के लिए प्रोत्साहन देने का आह्वान किया गया था.

2. सांस्कृतिक पहचान है भाषाः

यह दुनिया बहुभाषी है और यहां विविध संस्कृति के लोग रहते हैं. अपनी मातृभाषा (Mother Language) को संरक्षित कर इसे उन्नत बनाना अति आवश्यक है. हमारा देश शुरू से ही विविधता और बहुलता में विश्वास करता आ रहा है. यहां सभी भाषाओं का सम्मान किया जाता है. भाषा और संस्कृति दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. इसलिए जरूरी है अपनी भाषा को मजबूती प्रदान करने की. भाषा किसी भी संस्कृति की जीवनरेखा होती है.

17 नवंबर 1999 को यूनेस्को द्वारा अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस को स्वीकृति दी गई थी. जबकि 21 फरवरी 2000 से प्रति वर्ष अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का पालन किया जाता है. इस दिवस को पालन करने का मूल उद्देश्य पूरे विश्व में सभी भाषाओं को बढ़ावा देना है.

3. मातृभाषा में शिक्षा अनिवार्यः

भारत में मातृभाषा में शिक्षा देना अनिवार्य होना चाहिए. ताकि मातृभाषा को प्रोत्साहन दिया जाए. इसके लिए हर व्यक्ति को एकजुट होना पड़ेगा. अन्यथा अंग्रेजी की बढ़ती मांग में हमारी मातृभाषा विलुप्त हो जाएगा. सब मिलकर अगर इसके लिए आगे बढ़ेंगे तो इससे हमें अखिल भारतीय और वैश्विक नागरिक बनने में सहायक सिद्ध होगा.

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source: bitsindia

कुछ और भी बिंदु हैं –

4. गर्व से बोलें मातृभाषाः

मातृभाषा ही हमारी असली पहचान है. इससे न सिर्फ आपका बल्कि पूरे देश का मान बढ़ता है. दुनिया के हर देश में वहां के लोग मातृ भाषा ही बोलते हैं. सिर्फ बोलना ही नहीं वे अपनी भाषा का प्रसार भी करते हैं. तमाम देशों के लोग अपनी भाषा में संवाद कर गर्व महसूस करते हैं, तो फिर हम क्यूं नहीं? मातृभाषा को प्रोत्साहन देना साक्षरता के विस्तार का सुंदर विकल्प हो सकता है.

ब्रिटिश शासन की वजह से ही आज अंग्रेजी ने लोगों पर कब्जा जमा लिया है. हर संस्थान में यही प्रमुख बन भी बन गई है. दुःख की बात तो यह है शहरों में पढ़ाई करने वाले अधिकतर बच्चे अपनी मातृभाषा में न तो बोल पाते हैं, ना ही लिख पाते हैं. लेकिन इस स्थिति में परिवर्तन लाना जरूरी है. मातृभाषा की जानकारी हर किसी को होनी चाहिए. अपनी मातृभाषा बोलने में किसी को शर्म नहीं बल्कि गर्व महसूस होना चाहिए.

5. मातृभाषा के साथ अन्य भाषा भी जरूरीः

हर किसी को पहले अपनी मातृभाषा सीखने पर बल देना चाहिए. मातृभाषा के साथ-साथ आप अन्य भाषा भी सीखें. पर अपनी भाषा को नकार कर नहीं. इसलिए पहले बच्चे को मातृभाषा फिर अन्य भाषाओं की शिक्षा दें. ताकि सभी भाषाओं को जोड़कर बहुभाषी और सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत किया जाए. यह जरूर ध्यान रखें कि बहुसांस्कृतिक विश्व की संकल्पना मातृभाषा को मजबूत कर ही साकार होगी.

mother language bangladesh
source: dailyasianage

क्या आप जानते हैं?

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन यानी यूनेस्को द्वारा नवंबर 1999 में घोषित किया था कि प्रति वर्ष 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का पालन किया जाएगा. बांग्लादेश में भाषा आंदोलन दिवस इसी तारीख को मनाया जाता है. याद रहे कि बांग्लादेश के गठन में मातृभाषा का मुद्दा ही महत्वपूर्ण था, क्योंकि तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में उर्दू को जबरदस्ती थोपा जाना यहां के लोगों को मंजूर नहीं हुआ.

इसके बाद ही 21 फरवरी, 1952 को ढ़ाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने भाषा को लेकर विद्रोह शुरू कर दिया था. इसी आंदोलन के दौरान बांग्लादेश का निर्माण हुआ था. इस विद्रोह में कई लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी थी. बांग्लादेश में तभी से 21 फरवरी को भाषा आंदोलन दिवस या शहीद दिवस का पालन किया जाता है.

मातृभाषा की जानकारी हर व्यक्ति को होनी चाहिए. आपकी भाषा ही आपकी पहचान है. फिर इसे बोलने में शर्म कैसा? हमें तो मातृभाषा बोलते हुए गर्व की अनुभूति होनी चाहिए. वैसे तो वैश्विक मांग के अनुसार अन्य भाषाओं की जानकारी रहना भी जरूरी है. आपको हमारा विचार कैसा लगा? क्या आप मेरे इस विचार से सहमत हैं? ‘योदादी’ के साथ अपने अनुभव को कमेंट कर जरूर शेयर करें. #motherlanguage

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