Home Annex आंकड़ों के जादूगर महालनोबिस आज भी हैं ख़ास

आंकड़ों के जादूगर महालनोबिस आज भी हैं ख़ास

सांख्यिकी के जनक महालनोबिस को भारत के द्वितिय पंचवर्षिय योजना के मसौदे तैयार करने के लिए जाना जाता है. उन्होंने ही कोलकाता में सांख्यिकी संस्थान (National Statistics Day) की स्थापना की थी.

आर्थिक योजना व सांख्यिकी विकास के क्षेत्र में प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक व सांख्यिकीविद् प्रशांत चंद्र महालनोबिस (Prasanta Chandra Mahalanobis) के योगदान के सम्मान में ‘राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस’ मनाया जाता है. राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस (National Statistics Day) को मनाने का मूल उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक नियोजन और आर्थिक नीति निर्धारण में प्रोफेसर महालनोबिस की भूमिका के बारे में लोगों को जागरूक करना.

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राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस ( National Statistics Day)

खासकर युवाओं में जागरूकता पैदा कर उन्हें प्रेरित भी करना है. यह जानना जरूरी है कि इंडिया में करीब छह दशक पहले लागू किया गया योजनाबद्ध विकास मॉडल सांख्यिकी की ही देन है. डाटा को प्लानिंग से एकत्र करना ही सांख्यिकी (National Statistics Day) है. जनसंख्या, कृषि शिक्षा, व्यवसाय व उद्योग क्षेत्र से जुड़े डाटा नेशनल सर्वे संगठन ही जुटाता है.

महालनोबिस मूल रूप से भौतिकी से विद्वान थे लेकिन उनके कार्यों की वजह से उनकी गिनती सांख्यिकीविद् से तौर पर की जाती है. आर्थिक योजना व सांख्यिकी विकास में उनका उल्लेखनीय योगदान है. इसी कारणवश वर्ष 2007 में सरकार की तरफ से उनके जन्मदिन के अवसर पर 29 जून को इस दिवस का पालन करने का निर्णय लिया गया.

सांख्यिकी के जनक महालनोबिस को भारत के द्वितिय पंचवर्षिय योजना के मसौदे तैयार करने के लिए जाना जाता है. उन्होंने ही कोलकाता में सांख्यिकी संस्थान (National Statistics Day) की स्थापना की थी. बड़े पैमाने के सैंपल सर्वे की डिजाइन में उनका अहम योगदान था.भारत की आजादी के पश्चात् महालनोबिस को नव गठित मंत्रिमंडल का सांख्यिकी सलाहकार बनाया गया था.

शुरुआत (Beginning):

देश की आजादी के बाद आर्थिक योजना व सांख्यिकी विकास के क्षेत्र में प्रोफेसर महालनोबिस के योगदान के मद्देनजर भारत सरकार ने उनके जन्म दिवस को विशेष दिन की श्रेणी में रखा है. उनके जन्म दिवस 29 जून को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष दिवस की श्रेणी में रखकर सांख्यिकी दिवस के रूप में मनाने का फैसला लिया गया था.

इसकी अधिसूचना 5 जून 2007 को भारत के राजपत्र में प्रकाशित हुई थी. यह दिन राष्ट्रीय विकास में सरकारी संख्यिकी के महत्व को उजागर करता है. दुनिया के 100 से अधिक देशों में राष्ट्रीय और क्षेत्रिय सांख्यिकीय दिवसों (National Statistics Day) का आयोजन बहुत पहले से किया जा रहा है.

सांख्यिकी दिवस से जुड़े तथ्य –

  • आर्थिक योजना व सांख्यिकी विकास के क्षेत्र में प्रशांत चंद्र महालनोबिस का अहम योगदान था.
  • इसलिए भारत सरकार उनके जन्म दिवस के मौके पर 29 जून को सांख्यिकी दिवस का पालन करती है.
  • राष्ट्रीय स्तर पर इस दिवस का पालन किया जाता है.
  • इस दिवस पर देश भर में विभिन्न तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है.

सांख्यिकी में रुचि (Intrest in Statistics):

29 जून 1893 को कोलकाता में जन्में महालनोबिस को सांख्यिकी में बाद में रुचि जगी थी. माध्यमिक तक की पढ़ाई ब्रम्हो ब्वायज स्कूल से पूरी करने के बाद प्रेसीडेंसी से भौतिकी विषय में आनर्स किया. इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वे लंदन चले गए. वहां के कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से भौतिकी व गणित दोनों में डिग्री हासिल की थी.

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भौतिकी में उन्होंने पहला स्थान प्राप्त किया था. इसके बाद फिर वे कोलकाता लौट आए थे. अपने शिक्षक डब्ल्यू एच मैकाले के कहने पर उन्होंने‘बायोमेट्रिका’नम की पुस्तक पढ़ी थी. इस किताब को पढ़ने के बाद सांख्यिकी की तरफ इनकी रुचि बढ़ गई.

सांख्यिकी पर काम शुरू –

फिर इन्होंने ब्रजेंन्द्रनाथ सील की निगरानी में सांख्यिकी पर काम शुरू किया. इस दिशा में इनका पहला काम कॉलेजों के परीक्षा परिणामों का सांख्यिकीय माध्यम से विश्लेषण. ‘जुलोजिकल एंड एंथ्रोपोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया’ के निदेशक नेल्सन अन्नाडेल से उनकी मुलाकात हुई.

नेल्सन में महालनोबिस को संस्थान की तरफ से कोलकाता के ऐंग्लो इंडियंस के बारे में जुटाए गए आंकड़ों का विश्लेषण करने की ड्यूटी दी थी. इस विश्लेषण के रिजल्ट को भारत में सांख्यिकी का पहला शोध-पत्र कहा जा सकता है.

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प्रशांत चंद्र महालनोबिस (Prasanta Chandra Mahalanobis)

रवीन्द्रनाथ टैगोर से परिचय –

प्रतिभावान महालनोबिस की रुचि विज्ञान के अलावा साहित्य में भी थी. उनके गुरु टैगोर के साथ अच्छे संबंध थे. वर्ष 1910 में शांति-निकेतन जाने के बाद गुरुदेव टैगोर के साथ इनके संबंध और प्रगाढ़ होने लगे. उन्होंने रवीन्द्रनाथ के साथ कई देशों की यात्रा की और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज भी लिखे. धीरे-धीरे प्रोफेसर महालनोबिस की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी.

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय में सरकार ने उनसे मदद लेने शुरू किया था. बाढ़ नियंत्रण व कृषि के क्षेत्र में उन्होंने कई अद्भूत प्रयोग किये थे. बाढ़ नियंत्रण के लिए इन्होंने सरकार को जो दिशा सुझाए थे, उस पर अमल भी किया गया. सरकार को इस दिशा में भरपूर सफलता भी मिली थी.

योगदान (Contribution):

महालनोबिस का सबसे बड़ा योगदान उनके द्वारा शुरू किया गया ‘सैंपल सर्वे’ है. इसी के आधार पर आज बड़ी-बड़ी नीतियां व योजनाएं बनाई जा रही हैं. सबसे पहले इसकी शुरूआत एक निश्चित भू-भाग पर होने वाली जूट की फसल के आंकड़ों से की और इसके माध्यम से उन्होंने बताया था कि किस तरह उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है.

उनके काम करने के तरीके को लेकर कई बार सवाल खड़े किये गए लेकिन इन्होंने हर बार खुद को सिद्ध करने का प्रयास किया. इसके बाद उनके कार्यों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली. उसके बाद उन्हें ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से 1944 में ‘वेलडन मेडल’ से सम्मानित किया गया था.

रॉयल सोसायटी ने वर्ष 1945 में उन्हें अपना फेलो नियुक्त किया. सांख्यिकी का उपयोग देशहित में करने के लिए महालनोबिस ने पंचवर्षिय योजनाओं के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

भारतीय सांख्यिकी संस्थान –

भारतीय इतिहास के लिए 17 दिसंबर 1931 का दिन बेहद महत्वपूर्ण है. महालनोबिस का सपना इसी दिन साकार हुआ था और कोलकाता में भारतीय सांख्यिकी (National Statistics Day) संस्थान की स्थापना हुई थी. यही इसका मुख्यालय है. अभी इसकी स्थापना बैंगलोर, हैदराबाद, पुणे, दिल्ली, कोयंबटूर, चेन्नई, गिरिडीह समेत कुल 10 स्थानों में स्थापित है.

सम्मान (Respect):

भारतीय सांख्यिकी संस्थान को वर्ष 1959 में राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया. वर्ष 1957 में महालनोबिस को अंतरराष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थान का सम्मानित अध्यक्ष बनाया गया. वर्ष 1945 में लंदन की रॉयल सोसायटी ने उन्हें अपना फेलो नियुक्त किया था. वर्ष 1950 में इंडियन साइंस कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे. अमेरिका के एकोनोमेट्रिक सोसायटी के फेलो नियुक्त हुए थे.

फिर 1952 में पाकिस्तान सांख्यिकी संस्थान का फेलो बनाया गया था. 1957 में उन्हें देवी प्रसाद सर्वाधिकार स्वर्ण पदक मिला था. वहीं 1959 में वे किंग्स कॉलेज का मानद फेलो नियुक्त हुए थे. वर्ष 1968 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान पद्म विभूषण व वर्ष 1968 में श्रीनिवास रामानुजम स्वर्ण पदक मिला था.

इसके अलावा उन्हें और भी कई सम्मान मिले थे. महालनोबिस ने दुनिया को यह बताया कि सांख्यिकी का प्रयोग आम लोगों की भलाई के लिए किया जा सकता है. इनकी मृत्यु 28 जून 1972 को हुई थी. इस आलेख को पढ़ने के बाद अपने अनुभव को ‘योदादी’ के साथ कमेंट कर जरूर शेयर करें. #NationalStatisticsDay

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