Home Education व्यक्तित्व के विकास में सहायक होती है नाट्य कला!

व्यक्तित्व के विकास में सहायक होती है नाट्य कला!

रंगमंच की दुनिया भी बड़ी मजेदार होती है. नाटक भाषा शिक्षण की एक महत्वपूर्ण विद्या है. यह बच्चों में रचनात्मकता व सृजनात्मकता का विकास करने का एक शक्तिशाली माध्यम है.

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रंगमंच की दुनिया भी बड़ी मजेदार होती है. नाटक (Theatrical Arts) भाषा शिक्षण की एक महत्वपूर्ण विद्या है. नाटक बच्चों में रचनात्मकता व सृजनात्मकता का विकास करने का एक शक्तिशाली माध्यम है. विद्यालय की संकल्पना में समाहित तमाम उद्देश्यों को प्राप्त करने में भी यह सहायक होता है.

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Theatrical Arts । source: behance

नाटक से होने वाले लाभ में समानता, अभिव्यक्ति, लोगों के साथ बातें करना, चर्चा करना, प्रश्न करना, सीखने का मौका देना, लोगों पर विश्वास करना, आसपास के वातावरण के प्रति संवेदनशीलता पैदा करना आदि शामिल है.

प्रभावशाली (Impressive):

किसी कहानी को नाट्य कला (Theatrical Arts) के माध्यम से दर्शकों के समक्ष प्रभावपूर्ण ढ़ंग से पेश करने का अपना अलग ही मजा है. कहा जाता है कि रंगमंच व अभिनय का काम करने व किसी कहानी को दर्शकों तक प्रभावपूर्ण ढ़ंग से पहुंचाने के लिए सबसे पहले जरूरी है अपने अविश्वासों का त्याग करना.

नाटक (Theatrical Arts) देख रहे दर्शकों को पता होता है कि प्रदर्शित किए जा रहे नाटक की कहानी वास्तविक नहीं है. लेकिन जैसे ही नाटक शुरू होता है, उसे देखने वाले भी अपने अविश्वासों का त्याग कर नाटक में घुल जाते हैं. दर्शक भी नाटक की कहानियों के साथ-साथ जुड़ जाते हैं. देखते-देखते वे नाटक के माध्यम से ही सही एक अन्य दुनिया में प्रवेश कर जाते हैं.

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Theatrical Arts । source: zeenews

सामाजिक विकास में सहायक (Helpful in Social Development):

समाज में हो रहे मूल्यों का ह्रास आज सबसे बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है. वर्तमान शिक्षा पद्धति सूचना से भरपूर है. लेकिन एक बच्चा जो देश का भविष्य होता है उसमें सामाजिक व नैतिक मूल्यों को विकसित करने में सक्षम नहीं हो रहा है. इसकी एक प्रमुख वजह है विद्यार्थियों का अपने समाज, अपनी संस्कृति की जानकारी न हो पाना. अभिभावक भी बच्चों में ज्ञान पर ध्यान ना देकर सिर्फ परीक्षा में अधिक अंक लाने पर बल देते रहते हैं.

साहित्यसङ्गीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः।
तृणं न खादन्नपि जीवमानस्तद्भागधेयं परमं पशूनाम्॥

अर्थात जो मनुष्य साहित्य, संगीत अथवा किसी भी अन्य कला से विहीन है, वो साक्षात पुंछ और सींगो से विहीन जानवर की तरह है. यह जीव घास तो नहीं खाता पर अन्न से जीता रहता है. ऐसे मनुष्य को परम पशुओं की श्रेणी में रखना चाहिए.

माता-पिता अपने बच्चे की सफलता की तुलना अन्य बच्चे के साथ करते हैं. इस तुलना का बच्चे के मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है. हर तरफ बस रुपये कमाने की होड़ लगी है. अमीर बनने की धून में लोग रिश्तों का ख्याल तक नहीं रख रहे. या फिर यूं कहें कि धनी बनने के चक्कर में लोग रिश्तों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं.

तनाव भरे इस युग में बच्चों के लिए नाट्य (Theatrical Arts) शिक्षा बहुत ही लाभदायक साबित होगी. नाटक के माध्यम से बच्चों में कला प्रेम में काल प्रेम की भावना जागृत होती है. नाट्य कला में मानसिक तनाव को दूर करने की अपार क्षमता है. इससे बच्चों में नैतिक व सामाजिक मूल्यों को स्थापित करने में भी सहायता मिलती है. फिर यही बच्चे भविष्य में उन्नत समाज, उन्नत राष्ट्र का निर्माण करते हैं.

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Theatrical Arts । source: shrinaradmedia

धीरे-धीरे पनपती है प्रतिभा (Gradually grows talent):

कोई भी इंसान जन्म से कलाकार नहीं होता. धीरे-धीरे समय के साथ उसमें ये चीजें विकसित होती हैं. जीवन क्षेत्र में रोजाना के क्रिया-कलापों को करते ही लोगों के अंदर छीपी हुई प्रतिभाओं का विकास होता है. बड़ों की तुलना में बच्चों के लिए यथार्थ की दुनिया से काल्पनिक दुनिया में खोना काफी आसान होता है.

बच्चों की इसमें रूचि भी बहुतायत से होती है. बच्चों में अभिनय, कहानी सुनाने व अपने अविश्वासों को त्यागने के तमाम कार्यों को एक साथ करने की क्षमता होती है. जैसे-जैसे बच्चों की उम्र बढ़ती है, वे उंची कक्षा में जाते हैं वैसे-वैसे पढ़ाई का दबाव बढ़ता है. ऐसे में भी बच्चों में कल्पना व अभिनय करने की क्षमता हमेशा उपस्थित रहती है.

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आपके बच्चों मे निहित कल्पनाशीलता और सृजनात्मकता को बचपन में ही सही ढ़ंग से पेश किया जाए तो यह भी दूसरे मानसिक कौशलों की तरह स्थायी कौशल के रूप में विकसित हो सकती है. बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तब भी पेशेवर जीवन में शक्तिशाली उपकरणों के रूप में यह हमेशा उपस्थित रह सकती है. यह बहुत ही लाभदायक साबित होता है.

नाटक (Theatrical Arts) का प्रारंभिक अभ्यास शुरू करते वक्त ग्रुप के सभी सदस्यों के साथ कार्यशाला करते हैं. जिसमें स्थिर नामक गतिविधि को सबसे पहले करवाया जाता है. इस विधि से हमें यह समझने का मौका मिलता है कि हम बिना किसी सेट का उपयोग किए सिर्फ अभिनय करने वालों व उनके शरीरों को आधार बनाकर रंगमंच पर कैसे विषय को स्थापित कर सकते हैं.

बच्चों को दें मौका (Give chance to children):

इस गतिविधि को बच्चों के साथ भी आसानी से किया जाता है. नाटक के रिहर्सल के दौरान कहानी के आधार पर बच्चों को मौका दें कि वह दृश्य को कैसे दिखाएगा. तब बच्चा अपने अंदर के विचारों व भावों को खुद ही व्यक्त करता है.

विभिन्न किस्म की गतिविधियां उनको अपनी भूमिका को पहचानने व उसके विषय में सोचने व स्वाभाविक सृजनात्मक बनाने व समय के अनुसार अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने हेतु प्रशिक्षित होते हैं. इस तरह का कौशल विकास जीवन भर के लिए उपयोगी होते हैं.

इसको देखते हुए ‘नवआयाम’ की तरफ से अनोखी पहल की गई है. पिछले दिनों महानगर कोलकाता स्थित ऐतिहासिक जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी के रथीन्द्र मंच प्रेक्षागृह में आयोजित एक कार्यक्रम में बच्चों को रंगमंच के साथ ही कला के किसी भी प्रारूप में आगे बढ़ने को प्रेरित किया गया. संस्था की ओर से नई प्रतिभाओं को ‘सुशीला चौधरी कला प्रोत्साहन पुरस्कार’ दिया गया. इस अवसर पर बच्चों ने अपनी कला का प्रदर्शन भी किया.

महिलाओं ने निभाई पुरुष की भूमिका

भाषा-संस्कृति के प्रचार-प्रसार तथा जागरुकता के लिए गत 21 अप्रैल को ‘नवआयाम’ की तरफ से मैथिली नाटक “कनफुसकी” का सफल मंचन किया गया। एसटीडी बूथ के इर्द-गिर्द घूमने वाले इस नाटक को लेखक रूपेश त्योंथ ने संजीदगी से उकेरा है. उल्लेखनीय है कि दर्शकों को मोहित करने वाले इस नाटक में हिस्सा लेने वाली तमाम कलाकार महिलाएं ही थी. ‘सखी-बहिनपा’ के सौजन्य से आयोजित इस नाटक का निर्देशन श्रीमती किरण झा ने किया. ‘नवआयाम’ की इन महिला कलाकारों ने बड़ी खूबसूरती के साथ नाटक का मंचन किया. ऐसा कम ही देखा जाता है कि महिलाएं ही पुरुष पात्र में रंगमंच पर दिखे। नाटक महानगर में चर्चा का केंद्र बना हुआ है.

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित काठमांडू (नेपाल) की श्रीमती आरती झा को मैथिली भाषा-संस्कृति में योगदान के लिए तथा सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती सुनीता धनानिया का अभिनंदन किया गया. बता दें कि नाट्य कला (Drama) साहित्य का ही एक भाग है. समाज व नाटक का संबंध वर्षों पुराना है. नाटक के माध्यम से अपनी भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को प्रदर्शित किया जा सकता है. नाटक एक तरफ जहां लोगों के मनोरंजन का केंद्र है, दूसरी तरफ लोगों के साथ संवाद स्थापित करने का भी सशक्त माध्यम है. लोगों को किसी विषय के प्रति जागरुकता फैलाने में भी नाटक अहम भूमिका अदा करता है.

लिहाजा रंगमंच की इस कला को हर स्कूल में शामिल करना चाहिए. पढ़ाई के साथ-साथ इसका अभ्यास भी नियमित रूप से हो. रंगमंच की विशेष कला अभिनय कला के विभिन्न तत्वों पर आधारित है. रचनात्मक व सृजनात्मक विकास का बेहतर माध्यम नाट्य कला को माना जाता है. यह कला बच्चों के भविष्य के लिए भी लाभदायक सिद्ध होते हैं. बच्चों की बेहतरी के लिए विद्यालयों में नाट्य कला के अभ्यास की व्यवस्था होनी चाहिए.

अगर आप मेरे विचारों से सहमत हैं तो ‘योदादी’ के साथ अपने अनुभव को कमेंट कर जरूर शेयर करें. #TheatricalArts

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