Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी कथा और महत्व

    भगवान गणेश सभी देवताओं में प्रथम पूजनीय माने जाते हैं. रोचक है भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश के जन्म की कहानी. Ganesh Chaturthi

    आज पूरे देश भर में गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) का त्योहार मनाया जा रहा है. इस पावन पर्व को विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है. कई जगह इसे डण्डा चौथ के नाम से भी जाना जाता है. भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश जी का जन्म भादो मास के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी के दिन हुआ था. इसलिए इस दिन को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है.

    Ganesh Chaturthi

    यह गणेश उत्सव 10 दिनों तक चलेगा और अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति का विसर्जन होगा. महाराष्ट्र में गणेशोत्सव भव्य रूप में होता है. वहीं ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह त्योहार अगस्त या फिर सितंबर महीने में मनाई जाती है.

    गणेश चतुर्थी शुभ मुहूर्त ((Ganesh Chaturthi)

    शाम 4.23 से 7. 22 मिनट तक

    रात में 9.12 मिनट से 11. 23 मिनट तक

    चन्द्र दर्शन ना करने का समय : रात 09:07:00 से 21:25:00 तक

    गणेश विसर्जन 1 सितंबर (मंगलवार) 2020 को

    गणेश चतुर्थी का महत्व

    किसी भी कार्य को आरंभ करने से पहले गणेश जी की पूजा की जाती है. गणेश जी गणों के स्वामी हैं, इसीलिए इनका नाम गणपति है. गणेश जी ((Ganesh Chaturthi) को विद्या-बुद्धि के प्रदाता और विघ्न-विनाशक माना गया है. किसी वर्ष अगर गणेश चतुर्थी मगंलवार के दिन पड़ती है तो उसे अंगारक चतुर्थी के नाम से जाना जाता है. गणेश चतुर्थी त्योहार को बहुत ही पवित्र और महान फल देने वाला बताया गया है.

    गणपति को सभी देवताओं में प्रथम पूजनीय माना गया है. मान्यता है कि इस दिन गणपति बप्पा को अपने घर में विराजमान करने से वे भक्तों के सभी विघ्न, बाधाएं दूर करते हैं. यही वजह है कि इन्हें विघ्नहर्ता भी कहते हैं. गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) के दिन लोग अपने घरों में गणपति जी को लाकर उनकी पूजा करते हैं. पूजा के 11वें दिन इनका विसर्जन किया जाता है. गणेश जी को विदाई देने के साथ ही भक्त अगले साल उनके जल्दी आने की कामना करते हैं.

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    भगवान गणेश की जन्म कथा (Ganesh Chaturthi)

    पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार नंदी से माता पार्वती की किसी आज्ञा का पालन करने में गलती हो गई. जिसके बाद माता पार्वती ने कुछ ऐसा बनाने का सोचा, जो सिर्फ उनकी आज्ञा का पालन करे. तुरंत ही उन्होंने अपने उबटन से एक बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण डाल दिया. कहा जाता है कि जब माता पार्वती स्नान कर रही थीं तो वह बालक (Ganesh Chaturthi) बाहर पहरेदारी कर रहा था.

    माता पार्वती ने ही उसे पहरा देने का आदेश दिया था. बालक से उन्होंने कहा था कि बिना उनकी आज्ञा के किसी को अंदर न आने दिया जाए. इसके बाद जैसे ही भगवान शिव के गण आए तो आज्ञानुसार बालक ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया. इसके बाद फिर खुद ही भगवान शिव आए तो बालक ने उन्हें भी अंदर नहीं जाने दिया.

    इस बात से शिव जी को बहुत तेज गुस्सा आया और उन्होंने बालक (Ganesh Chaturthi) का सिर धड़ से अलग कर दिया. जैसी ही माता पार्वती बाहर आईं और उन्होंने देखा तो वह क्रोधित हो गईं और उन्होंने भगवान शिव से बालक को वापस जीवित करने के लिए कहा, तो शिव जी ने एक हाथी का सिर बालक के धड़ से जोड़ दिया

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