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IVF से प्रेग्नेंसी में महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज का खतरा!

इन विट्रो फर्टिलाइजेशन से गर्भावस्था में अधिकांश महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज की समस्या होने की संभावना रहती है. IVF Pregnancy

इन विट्रो फर्टीलाइजेशन (आईवीएफ) को चिकित्सा जगत में एक चमत्कार माना जाता है. यह एक आसान फर्टिलिटी ट्रीटमेंट है. जिसके द्वारा महिलाएं गर्भवती (IVF Pregnancy) हो सकती हैं. जो महिलाएं प्राकृतिक रूप से गर्भवती नहीं हो सकती उनके लिए आईवीएफ तकनीक से प्रेग्नेंसी बहुत ही आसान व मॉडर्न तरीका है.

IVF pregnancy

इसका आविष्कार फैलापियन ट्यूब बंद होने के कारण निःसंतान रहने वाली महिलाओं को संतान सुख देने के लिए किया गया था. इस तकनीक से फर्टिलिटी ट्रीटमेंट की शुरुआत 1978 में हुई थी. इसके बाद से आईवीएफ में कई नई तकनीकें आ गयी हैं.

यूरोपियन सोसाइटी ऑफ ह्यूमन रिप्रोडक्शन एंड एम्ब्रायोलॉजी के अनुसार दुनिया भर में अब तक 8 मिलियन से अधिक आईवीएफ संताने पैदा हो चुके हैं. वैसे तो आईवीएफ एक आसान फर्टिलिटी ट्रीटमेंट है. जिसके द्वारा महिलाएं गर्भवती हो सकती हैं लेकिन रिसर्च बताती है कि आईवीएफ ट्रीटमेंट द्वारा प्रेग्नेंसी के 50% से ज्यादा मामलों में महिलाएं जेस्टेशनल डायबिटीज (IVF Pregnancy) का शिकार हो जाती हैं.

अनुमान है कि आईवीएफ तकनीक से लगभग 5 लाख बच्चे हर साल पैदा हो रहे हैं. हाल में हुए एक रिसर्च के मुताबिक आईवीएफ द्वारा गर्भवती होने वाली आधी से ज्यादा महिलाएं, प्रेग्नेंसी के दौरान ही डायबिटीज का शिकार हो जाती हैं.

आईवीएफ प्रेग्नेंसी और डायबिटीज –

नई शोध के अनुसार आईवीएफ के माध्यम से फर्टिलिटी ट्रीटमेंट कराने वाली 50% से ज्यादा महिलाओं में जेस्टेशनल डायबिटीज (IVF Pregnancy) का खतरा बना रहता है. ग्रीस की एरिस्टोटल यूनिवर्सिटी द्वारा की गई रिसर्च में करीब 63,760 महिलाओं को शामिल किया गया था. जो आईवीएफ या इंट्रासाइटोप्लाजमिक स्पर्म इंजेक्शन तकनीक से प्रेग्नेंट हुई थीं.

आईवीएफ और डायबिटीज का संबंध – IVF Pregnancy

ये अभी तक साफ नहीं हुआ है कि आईवीएफ से प्रेग्नेंसी के बाद डायबिटीज का खतरा क्यों बढ़ जाता है. लेकिन आईवीएफ ट्रीटमेंट के दौरान होने वाली मेडिकल स्थितियां ऐसी हों, जिनसे डायबिटीज बढ़ता हो. शोधकर्ताओं का मानना है कि महिला को सफलतापूर्वक गर्भवती करने के लिए कई उपाय किए जाते हैं.

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आईवीएफ फर्टिलिटी ट्रीटमेंट के दौरान अचानक से कई हार्मोन्स का इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए भी शायद प्रेग्नेंसी के बाद डायबिटीज (IVF Pregnancy) का खतरा बढ़ जाता है. इस स्टडी को बहुत ही जल्द ‘यूरोपियन एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ डायबिटीज’ की सालाना मीटिंग में रखा जाएगा.

जेस्टेशनल डायबिटीज से खतरा –

जेस्टेशनल डायबिटीज एक ऐसी समस्या है जिसमें महिलाएं प्रेग्नेंसी के दौरान ही डायबिटीज का शिकार हो जाती हैं. आमतौर पर महिलाएं प्रेग्नेंसी के 5वें महीने में डायबिटीज का शिकार होती हैं. हालांकि प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज कई बार खतरनाक हो सकता है.

क्योंकि इसके कारण महिला को गर्भपात हो सकता है, बच्चा कमजोर हो सकता है, बच्चा समय से पहले पैदा हो सकता है या गंभीर स्थितियों में महिला की मौत भी हो सकती है. ज्यादातर महिलाओं में डिलीवरी के बाद डायबिटीज की समस्या खत्म हो जाती है और शरीर नॉर्मल काम करने लगता है.

बच्चे पर डायबिटीज का प्रभाव – IVF Pregnancy

डायबिटीक (IVF Pregnancy) महिलाओं के बच्चों में मेक्रोसामिया जैसी बीमारी के होने का खतरा अधिक रहता है. मां के रक्त में अगर शुगर की मात्रा अधिक होती है तो बच्चे के शरीर में भी शुगर की मात्रा के बढ़ने की पूरी संभावना रहती है. बच्चों में यह अतिरिक्त शुगर प्रसव के दौरान वसा में बदल जाती है और ऐसे बच्चे जन्म‍ के समय मोटे होते हैं.

कई बार तो यह भी देखा जाता है कि होने वाले शिशु का आकार इतना बड़ा हो जाता है कि वैजाइनल डिलीवरी नहीं हो पाती. अंत में सिजेरियन डिलीवरी करनी पड़ती है. अगर गर्भावस्था के दौरान मां के शरीर में शुगर का स्तर अधिक होता है तो प्रसव के बाद बच्चे में ब्लड शुगर लो होने की पूरी गुंजाइश रहती है. बच्चे में कैल्शीयम, मैग्नीशियम की मात्रा भी असंतुलित होती है लेकिन इसे दवाओं से ठीक किया जा सकता है. गर्भवती महिलाओं का स्वयं पर ध्यान देना आवश्यतक होता है.

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गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज की दवाएं –

आप गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज की दवाएं ले सकती हैं. प्राय: गर्भावस्था के दौरान लोगों को अधिक मात्रा में इन्सुलिन की आवश्यकता होती है.

जेस्टेशनल डायबिटीज के खतरे को करें कमIVF Pregnancy

प्रेग्नेंसी पीरियड में और डिलीवरी के समय डायबिटीज होने पर परेशानी हो सकती है. इससे बचने के लिए बेहतर है कि महिलाएं डॉक्टर द्वारा दिए गए सलाह और इंसुलिन की डोज सही समय पर लेती रहें. इसके अलावा डाइट कंट्रोल करके भी जेस्टेशनल डायबिटीज के खतरे को कम किया जा सकता है.

इस दौरान शिशु पर डायबिटीज का असर न हो इसके लिए भी आपको सतर्क रहना जरूरी है. शिशु की निगरानी के लिए आपको कई बार अल्ट्रासाउंड टेस्ट की भी जरूरत पड़ सकती है. ज्यादातर समय जेस्टेशनल डायबिटीज के बाद पैदा हुए बच्चों का वजन सामान्य से ज्यादा होता है. #GestationalDiabetes

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