Home Calture Jivitputrika Vrat: जीवित्पुत्रिका या जितिया व्रत के लिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि...

Jivitputrika Vrat: जीवित्पुत्रिका या जितिया व्रत के लिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पौराणिक कथा

जीवित पुत्रिका व्रत, जिउतिया या जितिया प्रति वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को किया जाता है और महिलाएं इसे वंश वृद्धि और संतान की लंबी आयु के लिए करती हैं. Jivitputrika Jitiya Vrat

जीवित पुत्रिका व्रत, जिउतिया या जितिया इस साल 10 सितंबर को है. यह व्रत प्रति वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को किया जाता है और महिलाएं इसे वंश वृद्धि और संतान की लंबी आयु के लिए करती हैं. मान्यता है कि जो महिलाएं इस व्रत (Jivitputrika Jitiya Vrat) को रखती हैं उनके बच्चों के जीवन में सुख शांति बनी रहती है, उन्हें संतान वियोग नहीं सहना होता है.

Jivitputrika-Jitiya-Vrat

इसमें महिलाओं को 24 घंटे निर्जला और निराहार रहना पड़ता है. इस व्रत का सनातन धर्मावलंबियों में विशेष महत्व है. बंगाल, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस त्योहार का खास महत्व है. यह तीन दिनों तक चलने वाला व्रत है. इसमें पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन निर्जला व्रत और तीसरे दिन पारण किया जाता है.

महाभारत प्रसंग – Jivitputrika Jitiya Vrat

जीवित पुत्रिका व्रत की कथा सदियों पुरानी है, महाभारत काल से जुड़ी हुई है. कहावत है कि महाभारत युद्ध में अपने पिता की मृत्यु से अश्वत्थामा बहुत नाराज था. उसके अंदर बदले की भावना तेज थी. बदला लेने के लिए उसने पांडवों के शिविर में घुस कर द्रौपदी के पांचों संतान को पांडव समझकर सोते अवस्था में मार डाला था. इस अपराध के बाद अर्जुन ने उसे बंदी बनाकर उसकी दिव्य मणि छीन ली थी.

इसके जवाब में अश्वत्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में ही मारने के लिए ब्रहमास्त्र का उपयोग किया. इस ब्रह्मास्त्र को निष्फल करना बहुत ही कठिन था और उत्तरा की संतान का जन्म लेना उतना ही आवश्यक था. चूकि उत्तरा की संतान को पृथ्वी पर आना ही था इसलिए भगवान कृष्ण ने अपने तमाम पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसे फिर से गर्भ में ही जीवित कर दिया. अब वह गर्भ में ही मरकर जीवित हुई थी इसलिए उसका नाम जीवित पुत्रिका रखा गया. बड़ा होने के बाद यही राजा परीक्षित बना और तभी से जीवित पुत्रिका व्रत किया जाता है.

क्या है शुभ मुहूर्तJivitputrika Jitiya Vrat

इस वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि 9 सितंबर की रात्रि 9 बजकर 46 मिनट से शुरू होगी, जो 10 सितंबर की रात 10 बजकर 47 मिनट तक रहेगी. 10 सितंबर को अष्टमी में चंद्रोदय का अभाव है और इसी दिन जिउतिया पर्व मनाया जाएगा. व्रत करने से एक दिन पहले यानी 9 सितंबर को महिलाएं नहाय-खाय करेंगी.

गंगा समेत अन्य नदियों में स्नान करने के बाद मंड़ुआ रोटी, नोनी का साग, कंदा और झिमनी आदि खाएंगी. व्रत रखने वाली महिलाएं स्नान-भोजन करने के बाद पितरों का पूजा-पाठ भी करेंगी. इसके बाद 9 सितंबर की रात्रि 9 बजकर 46 मिनट से व्रत प्रारंभ हो जाएगा. जीवित पुत्रिका व्रत के पारण का शुभ समय अगले दिन यानी 11 सितंबर की सुबह सूर्योदय से लेकर दोपहर 12 बजे तक है.

जीवित्पुत्रिका या जितिया व्रत के लिए पूजन विधिJivitputrika Jitiya Vrat

1. जीवित पुत्रिका व्रत के दिन महिलाएं स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं.

2. इस दिन जीमूतवाहन की कुशा से निर्मित प्रतिमा की पूजा की जाती है. इस पूजा में धूप-दीप, चावल, पुष्प आदि अर्पित किया जाता है.

3. गाय के गोबर और मिट्टी से चील व सियारिन की मूर्ति बनाई जाती है.

4. इस मूर्ति के माथे पर लाल सिंदूर का टीका लगाया जाता है.

5. पूजा समाप्त होने पर बाद व्रति जीवितपुत्रिका व्रत की कथा सुनती हैं.

6. अगले दिन पारण के बाद पंडित या फिर किसी जरूरतमंद को दान, दक्षिणा दिया जाता है.

(योदादी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here