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Karwa Chauth Vrat: सुहागिनों के लिए करवा चौथ व्रत की कथा और महत्व

सुहागन महिलाएं पति की लंबी उम्र की कामना करते हुए करवा चौथ का व्रत (karwa Chauth Vrat katha aur Mahatva in hindi) रखती हैं. कहावत है कि इससे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है.

आज पूरे देश में करवा चौथ का व्रत (Karwa Chauth Vrat katha aur Mahatva in Hindi) मनाया जा रहा है. सुहागन महिलाएं पति की लंबी उम्र की कामना करते हुए यह निर्जला व्रत रखती हैं. कहावत है इससे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है. पूरे दिन व्रत रख कर और रात को चंद्रमा की पूजा के बाद पति का चेहरा देखते हुए अन्न व जल ग्रहण करती हैं. सुहागनों के लिए यह व्रत बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है. यह व्रत कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि को होता है. इसे खासतौर पर पंजाब, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में मनाया जाता है.

karwa Chauth

इस वर्ष बना है बहुत ही शुभ संयोग

इस वर्ष करवा चौथ व्रत पर बहुत ही शुभ संयोग बन रहा है. आज बुध के साथ सूर्यग्रह भी विद्धमान होंगे. इसके आलावा इस शिव योग के साथ सर्वार्थ सिद्धि, सप्त कीर्ति, महादीर्घायु व सौख्य योग बन रहे हैं. इन सभी योग के कारण करवा चौथ का व्रत और भी मंगलकारी बन गया है. यह करवा चौथ सुहागिनों के लिए अखंड सौभाग्य देने वाला होगा.

करवा चौथ का शुभ मुहुर्त – Karwa Chauth Vrat katha aur Mahatva in hindi

चतुर्थी तिथि प्रारंभ – 4 नवंबर (बुधवार) की सुबह 3 बजकर 24 मिनट

तिथि समाप्त – 5 नवंबर (गुरुवार) की सुबह 5 बजकर 14 मिनट

व्रत का समय – 4 नवंबर की सुबह 6 बजकर 35 मिनट से रात 8 बजकर 12 मिनट तक

व्रत की कुल अवधि – 13 घंटे 37 मिनट

पूजा का शुभ मुहुर्त – 4 नवंबर की शाम 5 बजकर 34 मिनट से शाम 6 बजकर 52 मिनट तक

पूजा मुहुर्त की कुल अवधि -1 घंटा 18 मिनट

इस दिन चंद्रोदय का समय – रात 8 बजकर 12 मिनट

करवा चौथ की पूजा विधि – karwa Chauth Vrat katha aur Mahatva in hindi

इस व्रत के लिए विवाहित महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं. रात को चंद्रमा देखकर उसे अर्घ्य देती हैं. इस पूजा के लिए पूजा स्थल को खड़िया मिट्टी से सजाया जाता है. फिर वहां माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित की जाती है. पूजा में शिव-पार्वती, गणेश व कार्तिकेय की मिट्टी से बनी मूर्तियों को भी पाट पर दूब में बैठाने की परंपरा है. वहीं सफेद मिट्टी या फिर बालू की वेदी बनाकर भी सभी देवताओं को विराजित करने की भी पंरपरा प्रचलित है.

पूजा के लिए जल से भरा मिट्टी का टोंटीदार कुल्हड़, दीपक पर रखी विशेष वस्तुएं और श्रृंगार की सभी नई वस्तुएं रखना जरूरी होता है. पूजा की थाली में चावल, रोली, दीप, धूप, दूब व फूल अवश्य रहती है. पूजा को दिया जलाकर शुरू किया जाता है और पारंपरिक तरीके से पूजा की जाती है. मौके पर करवा चौथ की कथा भी सुनाई जाती है. थाली सजाकर चांद को अर्घ्य देने के बाद पति के हाथों से मीठा पानी पीकर पतिव्रता महिलाएं दिन भर का व्रत खोलती हैं. फिर व्रत खोलने के बाद पूरे परिवार के साथ भोजन करना होता है.

करवा चौथ व्रत की कथा – karwa Chauth Vrat katha aur Mahatva in hindi

एक ब्राह्मण के सात पुत्र थे और उनकी एकमात्र बेटी थी, जिसका नाम वीरावती था. 7 भाइयों में अकेली बहन होने के कारण वीरावती सभी भाईयों की लाडली थी. वीरावती के भाई उसे जान से अधिक प्रेम करते थे. वीरावती का विवाह एक ब्राह्मण परिवार में हो गया. शादी के बाद वीरावती मायके आई और अपनी सभी भाभियों के साथ उसने करवा चौथ का व्रत रखा. लेकिन शाम होते-होते वीरावती भूख से व्याकुल हो गई.

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सभी भाई जब खाना खेने बैठे तो उन्होंने वीरा से भी खाने का आग्रह किया. तब बहन ने बताया कि आज उसका करवा चौथ का निर्जला व्रत है. इसलिए आज वो चंद्रमा को देखकर, उसे अर्घ्य देकर ही खाना खा सकती है. लेकिन अभी तक चंद्रमा नहीं निकला है इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल गई है. भाइयों से बहन की ये हालत देखी नहीं गई, तो एक भाई पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है. दूर से देखने पर लगता है जैसे चांद निकल आया है.

फिर एक भाई आकर बहन से कहता है कि चांद निकल आया है, अब तुम उसे अर्घ्य देकर खान खा सकती हो. बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर जाकर चांद देख आती है और उसे अर्घ्य देकर खाने बैठ जाती है. वीरावती ने जैसे ही पहला टुकड़ा मुंह में डाला वैसे ही उसे छींक आ गई. फिर जैसे ही दूसरा टुकड़ा डाला तो उसमें बाल निकल आया. उसके बाद अब तीसरा टुकड़ा मुंह में डालने की कोशिश ही कर रही थी कि उसे पति की मृत्यु का समाचार मिल गया.   

भाभी ने बताई सच्चाई

उसके साथ ऐसा क्यों यह उसकी भाभी उसे बताती है क्योंकि वो इस सच्चाई से अवगत थी. करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने की वजह से देवता वीरावती से नाराज हो गए हैं. एक बार इंद्र देव जी की पत्नी इंद्राणी करवाचौथ के दिन धरती पर आती हैं. तभी वीरावती उनके पास जाकर अपने पति की रक्षा के लिए प्रार्थना करती है. देवी इंद्रानी ने उससे पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ करवाचौथ का व्रत करने को कहती हैं.

इस बार वीरावती ने पूरी श्रद्धा के साथ करवाचौथ का व्रत रखा. इस श्रद्धा और भक्ति को देखकर भगवान प्रसन्न हो गए. और उन्होंने वीरावती को सदा सुहागन रहने का आशीर्वाद देकर उसके पति को जीवित कर दिया. तभी से करवा चौथ व्रत पर महिलाओं का अटूट विश्वास होने लगा.  

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