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‘द स्काई इज पिंक’ की असली नायिका आयशा, 14 की उम्र में बनीं मोटिवेशनल स्पीकर!

पल्मोनरी फाइब्रोसिस जैसी गंभीर बीमारी से ग्रसित आयशा चौधरी आज भी सबसे लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं. आयशा 14 वर्ष की उम्र में मोटिवेशनल स्पीकर बन गई थी. Motivational speaker Aisha Chaudhary

जिंदगी बहुत छोटी है इसके हर पल को खुलकर जीना सीखें. जिंदगी के हर पल को आप खास बना सकते हैं. जिंदगी को खुलकर जीने के लिए कुछ मजेदार करें और कुछ प्रेरणादायी (Motivational speaker Aisha) भी. भले ही जिंदगी छोटी है लेकिन इसे यादगार बनाया जा सकता है. जिंदगी जीने के सही मायने ये है कि मरने के बाद भी आप लोगों की यादों में रहें व उन्हें प्रेरणा देते रहें.

the sky is pink

ऐसी ही एक कहानी है आयशा चौधरी (Motivational speaker Aisha) की. 18 वर्ष की उम्र में वर्ष 2015 में दुनिया को अलविदा कहने वाली आयशा पर बॉलीवुड में ‘द स्काई इज पिंक’ फिल्म बनी है. आयशा की किताब ‘My Little epiphanies’ आज हर किसी को प्रेरित कर रही है.

‘द स्काई इज पिंक’ फिल्म की कहानी सच्ची घटना पर आधारित है. प्रियंका चोपड़ा, जायरा वसीम और फरहान अख्तर की मोस्ट अवेटेड फिल्म ‘द स्काई इज पिंक’ का ट्रेलर रिलीज हो गया है. फिल्म में प्रियंका और फरहान अख्तर दो टीनएज बच्चे रोहित सराफ और जायरा वसीम के पेरेंट्स बने हैं.

पल्मोनरी फाइब्रोसिस से ग्रस्त थी आयशा (Motivational speaker Aisha)

‘द स्काई इज पिंक’ में जायरा आयशा चौधरी (Motivational speaker Aisha) का किरदार निभा रही हैं. वैसे ये वही आयशा है जो देश के लिए प्रेरणा बन गई. यह एक ऐसी लड़की की कहानी है जो पल्मोनरी फाइब्रोसिस नामक फेफड़े के गंभीर रोग से ग्रस्त थी. बावजूद इसके वह एक सफल मोटिवेशनल स्पीकर थी.

यह कहानी उस लड़की की है जो तमाम विरोधी परिस्थितियों का सामना करते हुए सबके लिए प्रेरणादायी बनी. आयशा (Motivational speaker Aisha) आज भी लोगों की यादों में है. छोटी उम्र को बड़ा करके जीने वाली आयशा ने अपने जीवन से लाखों लोगों को प्रेरित किया है. गुरुग्राम की रहने वाली 13 वर्षीय मोटिवेशनल स्पीकर आयशा चौधरी जन्म से ही SCID (Severe Combined Immuno-Deficiency) नामक बीमारी से ग्रस्त थी.

6 महीने की उम्र में उसका बोन मैरो ट्रांसप्लांट हुआ था. वर्ष 2010 में जब आयशा 13 साल की थी तब पता चला कि उसे पल्मोनरी फाइब्रोसिस बीमारी है. यह बीमारी फेफड़ों के टिशू को प्रभावित करती है. जिससे सांस लेने में दिक्कत आती है. इस बीमारी की वजह से आयशा बहुत धीरे-धीरे काम करती थी. क्योंकि उसे थकान बहुत जल्दी होती थी.

14 की उम्र में बनी सफल प्रेरक वक्ता

काम के दौरान उसे किसी की मदद की भी आवश्यकता पड़ती थी. आयशा को स्कूल भी बहुत जल्दी छोड़ना पड़ा था लेकिन उसने हार नहीं मानी, वो रूकी नहीं. महज 14 साल की उम्र में आयशा प्रेरक वक्ता बन गई. इतनी कम उम्र में उसने कई बड़े मंच पर प्रेरणादायक भाषण दिए थे.

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साल 2011 व 2013 के INK सम्मेलनों में भी आयशा स्पीकर रहीं. वहीं वर्ष 2013 में TEDxPune में भी उसने भाषण दिया था. 3 फरवरी 2014 को जब आयशा महज 17 साल की थी उसने TedX में बोलते हुए कहा था कि मेरी कहानी सबसे अलग है. मेरी जिन्दगी बहुत कठिन है. कई स्लीपलेस नाइट मैंने बिताई है लेकिन मैंने ऐसा सोचा कि मैं अकेली नहीं हूं इस संसार में.

आयशा (Motivational speaker Aisha) की जिंदगी बहुत ही घुटन भरी थी. उसे ऑक्सीजन का सिलेंडर अपने साथ लेकर घूमना पड़ता था. इतनी घुटन भरी जिंदगी में भी आयशा मुस्कुरा रही थी. उसे पेंटिंग व लिखने का बहुत शौक था. जब आयशा बहुत ज्यादा बीमार रहने लगी, उसकी सेहत गिरने लगी तब भी उसने हार नहीं मानी.

पुस्तक पब्लिश होने के अगले दिन हुई मौत (Motivational speaker Aisha)

उसने बेड पर लेटे-लेटे ही लिखना शुरू किया. वह रोजाना कम से कम 5000 शब्द लिखा करती. आयशा के इसी लेख ने धीरे-धीरे किताब का रूप ले लिया. उसकी यह किताब ‘My Little Epiphanies‘ आयशा की मौत के मात्र कुछ घंटे पहले ही छपकर आई थी. खास बात ये है कि ये किताब आयशा की डेथ से ठीक एक दिन पहले 23 जनवरी 2015 को पब्लिश हुई और 24 जनवरी को आयशा इस दुनिया को छोड़ गई.

‘द स्काई इज पिंक’ बायोग्राफिकल ड्रामा है जिसका निर्देशन नेशनल अवॉर्ड विनर डायरेक्टर शोनाली बोस कर रही हैं. इसमें प्रियंका चोपड़ा 22 वर्ष की महिला से 60 साल तक की महिला के रोल में नजर आएंगी. इसकी पूरी कहानी प्रेरक वक्ता आयशा चौधरी के परिवार ही पर आधारित है.

क्या है पल्मोनरी फाइब्रोसिस –

विश्वभर में लगभग 50 लाख लोग पल्मोनरी फाइब्रोसिस जैसी खतरनाक बीमारी के शिकार हैं. पल्मोनरी फाइब्रोसिस एक ऐसी बीमारी है जिसमें मरीज के फेफड़ों के अंदरूनी ऊतक यानि टिशूज डैमेज हो जाते हैं. इस बीमारी में ऊतक मोटा और सख्त हो जाता है, जिससे मरीज के लिए सांस लेना कठिन हो जाता है और इसके रक्त को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिलता है.

भारत में इस बीमारी के प्रति जागरूकता न होने के कारण हजारों लोग हर साल मरते हैं जबकि उनमें से ज्यादातर को इसकी जानकारी भी नहीं होती. इस बीमारी के लक्षण इतने सामान्य होते हैं कि लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन इलाज में देरी और लापरवाही के कारण ये बीमारी जानलेवा साबित होती है.

बीमारी के लक्षणों को यहां जानें (Motivational speaker Aisha)

टी.बी. और दमा जैसी बीमारियों और फेफड़े की फाइब्रोसिस (पल्मोनरी फाइब्रोसिस) के लक्षणों में काफी समानता की वजह से कुछ डॉक्टर भी इस बीमारी की पहचान करने में चूक कर जाते हैं. पल्मोनरी फाइब्रोसिस के मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं.

1. लगातार सूखी खांसी का आना

2. सांस लेने में तकलीफ होना

3. भूख कम लगना

4. मांसपेशियों और जोड़ों के दर्द की समस्या

5. बेवजह वजन में लगातार कमी आना

रोग का इलाज –

पल्मोनरी फाइब्रोसिस गंभीर होने पर फेफड़े मधुमक्खी के छत्ते की तरह दिखने लगते हैं. जिसे हनीकॉम्बिंग कहते हैं. इस अवस्था में ऑक्सीजन देना ही आखरी इलाज बचता है. बीमारी की प्रारंभिक अवस्था में स्टेरायड, एन-एसिटाइल, सिस्टीन, परफेनिडोन आदि दवाओं का प्रयोग किया जाता है. फेफड़े की फाइब्रोसिस में फेफड़े का प्रत्यारोपण भी संभव हो सकता है. ऐसा ट्रांसप्लांटेशन हमारे देश में अभी शुरुआती अवस्था में है और अत्यधिक खर्चीला भी है. #TheSkyIsPink

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