Home Calture रक्षाबंधन से जुड़े रोचक और उपयोगी तथ्य – Raksha Bandhan in Hindi

रक्षाबंधन से जुड़े रोचक और उपयोगी तथ्य – Raksha Bandhan in Hindi

भाई-बहन के बीच अटूट स्नेह का त्योहार रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. यहां जानिए राखी का पर्व या रक्षा बन्धन से जुड़े कई सन्दर्भ. Raksha Bandhan in Hindi

भारत को त्योहारों का देश यूं ही नहीं कहा जाता है. यहां एक के बाद एक त्योहार सालभर मनाए जाते हैं. धार्मिक महत्व के त्योहार से अलग भाई-बहन के रिश्तों पर आधारित रक्षा बन्धन बेहद खास हो जाता है. हम सम्बन्धों को निभाना जानते हैं और उसमें खुशियां अगर शामिल हों तो बात ही अलग है. सामान्य स्तर पर मनाए जाने वाले ये त्योहार अब व्यापक रूप में होता है. खासकर बॉलीवुड की फिल्म और आधुनिक चलन ने इसे और रोचक बना डाला है.

यहां राखी का पर्व या रक्षा बन्धन से जुड़े सन्दर्भ सहित कई बारीक जानकारी आपसे शेयर कर रहे हैं. इनमें ऐतिहासिक, पौराणिक कनेक्शन से लेकर मनाने के तौर-तरीकों की भी चर्चा है.

राखी का त्योहार रक्षा बन्धन – Raksha Bandhan in Hindi

Raksha Bandhan in Hindi

भाई-बहन के बीच अटूट स्नेह का त्योहार रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. रक्षाबंधन वाले दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधते हुए भाई की लंबी आयु की कामना करती हैं. इसके बदले भाई आजीवन अपनी बहन की रक्षा का वचन देता है. भारत में रक्षा बंधन का त्योहार (Raksha Bandhan) बड़े धूमधाम से मनाया जाता है.

कैसे मनाया जाता है ‘रक्षा बन्धन’?

श्रावण पूर्णिमा पर सावन के अंतिम सोमवार को रक्षाबंधन का त्योहार कई शुभ योग व नक्षत्रों के संयोग में इस वर्ष 3 अगस्त को मनाया जा रहा है. ऐसा शुभ संयोग 29 साल बाद आया है. इस वर्ष रक्षाबंधन (Rakshabandhan) के मौके पर सर्वार्थ सिद्धि व दीर्घायु आयुष्मान योग बन रहा है. ज्योतिषाचार्य के अनुसार, 3 अगस्त को इस योग के साथ सूर्य शनि के समसप्तक योग, प्रीति योग, सोमवती पूर्णिमा, मकर का चंद्रमा श्रवण नक्षत्र उत्तराषाढ़ा नक्षत्र रहेगा. इससे पहले साल 1991 में तिथि वार और नक्षत्र का यह संयोग बना था.

इस बार भद्रा और ग्रहण का भी राखी (Rakhi Festival) के त्योहार पर कोई साया नहीं है. रक्षाबंधन से एक दिन पहले 2 अगस्त की रात्रि को 8 बजकर 43 मिनट से 3 अगस्त सुबह 9 बजकर 28 मिनट तक भद्रा रहेगा. फिर शाम 7 बजकर 49 मिनट से ही दीर्घायु कारक आयुष्मान योग भी लगेगा.

रक्षा बन्धन में ऐसे करें पूजन

जिन लोगों को रक्षाबंधन का व्रत रखना हो उन्हें सुबह उठकर स्नान करने के बाद वेदोक्त विधि से पित्र तर्पण और ऋषि पूजन करना चाहिए. बहनें रेशन का रक्षा कवच बनाकर उसमें सरसों सुवर्णा केशर, अक्षत, चंदन, दूर्वा रखकर रंगीन सूती वस्त्र में बांध दें और उस पर कलश की स्थापना करें. फिर विधि पूर्वक पूजन करें. बहनें भाई के दाहिनी हाथ में राखी बांधें इससे भाई का जीवन हमेशा सुखी रहेगा.

शास्त्रों में राखी बांधने के लिए अभिजीत मुहूर्त व गोधूली बेला को ही विशेष बताया गया है. 3 अगस्त की सुबह 10 बजकर 25 मिनट से शुभ अभिजीत मुहूर्त की शुरुआत होगी. जबकि शाम साढ़े 5 बजे से गोधुली बेला का शुभ मुहूर्त रहेगा. वहीं पूरे दिन चौघड़िया मुहूर्त में भी राखी बांधी जा सकती है.

रक्षाबंधन से जुड़ी पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएं – Raksha Bandhan History

रक्षाबंधन की यह परंपरा सदियों पुरानी है. पौराणिक कथा के अनुसार राखी त्योहार की परंपरा उन बहनों से शुरू की थी जो सगी बहनें नहीं थी. रक्षाबंधन का यह त्योहार कब प्रारंभ हुआ था इसकी सही जानकारी उपलब्ध नहीं है लेकिन इससे जुड़ी कई सारे कथाएं प्रचलित हैं, जिनका वर्णन पुरानों मे भी मिलता है. आइए अब बताते हैं रक्षाबंधन से जुड़ी कुछ धार्मिक और ऐतिहासिक (Raksha Bandhan History) कहानियों के बारे में.

पौराणिक कथाएं – Raksha Bandhan Ki Kahani

1. राजा बलि और मां लक्ष्मी की कथा

असुरों का राजा बलि जो कि 100 यज्ञ पूरे कर अजेय हो गया. इसके बाद वह पहले तो धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया. फिर वह स्वर्ग का सिंहासन प्राप्त करने की तैयारी में लग गया. देवराज इंद्र को इसकी खबर मिलते ही वे चिंतित हो गए और भगवान विष्णु की शरण में पहुंच गए और भगवान विष्णु से स्वर्ग का सिंहासन बचाने की प्राथना करने लगे. तभी भगवान विष्णु वामन अवतार धारण कर राजा बलि के दरबार में गए और उनके भिक्षा की याचना की.

राजा बलि बहुत ही दानवीर था और उसने वामन अवतार भगवान विष्णु को वचन दिया कि वह भिक्षा में जो भी मांगेगा उसे जरूर प्रदान किया जाएगा. फिर क्या था, भगवान विष्णु ने भिक्षा में उससे तीन पग भूमि मांग ली. अपना वचन निभाते हुए राजा बलि ने वामन अवतार विष्णु को तीन पग भूमि दान कर कहा कि वो तीन पग भूमि नाप ले.

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विष्णु जी ने पहले पग में पृथ्वी को दूसरे पग में स्वर्ग को नाप लिया. तीसरा पग नापने के पहले ही राजा बलि समझ चुका था कि उसके समक्ष उपस्थित वामन कोई साधारण इंसान नहीं है. उसने तुरंत ही अपना शीश वामन रूपी भगवान विष्णु के आगे झुका दिया. सिर झुकाने के बाद उसने उनसे तीसरा पग अपने शीश पर रखने का आवेदन किया और विष्णु जी ने भी वैसा ही किया. अब राजा बलि अपना सारा राज्य गंवाकर पाताल लोक में रहने को मजबूर हो गया.

लेकिन पाताल लोक जाने से पहले ही राजा बलि की प्रार्थना पर भगवान विष्णु अपने वास्तविक रूप में आ गए. विष्णु भी बलि की दानपूर्नता से अत्यंत प्रसन्न थे. इसलिए उन्होंने बलि से वर मांगने को कहा. इस पर बलि नो कहा कि भगवान मेरा तो सर्वस्व चला गया. अब तो आपसे मेरी बस यही प्रार्थना है कि आप हमेशा मेरे साथ रहें. विष्णु जी ने तथास्तु कहकर राजा बलि के साथ पाताल लोक रवाना हो गए.

माता लक्ष्मी ने बांधा था ‘रक्षासूत्र’

अब बैकुंठ में विष्णु जी की प्रतीक्षा कर रही देवी लक्ष्मी यह सूचना मिली तो वह काफी चिंतित हुईं. उन्होंने तुरंत ही नारद मुनि को बुलाकर उनसे इसका तोड़ पूछा. नारद मुनि ने उनसे कहा कि वे पहले तो राजा बलि को रक्षासूत्र बांधकर अपना भाई बना लें. और फिर उपहार के रूप में भगवान विष्णु को मांग लें. मां लक्ष्मी एक गरीब महिला का रूप धारण कर पाताल लोक पहुंच गई और राजा बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बांध दी.

रक्षासूत्र बंधवाने के बाद राजा बलि ने कहा कि आपको देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है. देवी लक्ष्मी अपने वास्तविक रूप में आकर बोलीं कि आपके पास तो साक्षात भगवान विष्णु हैं और मुझे वही चाहिए. बलि ने विष्णु जी को देवी लक्ष्मी के साथ जाने दिया. भगवान विष्णु ने जाते-जाते राजा बलि से कहा कि वह प्रति वर्ष 4 महीने पाताल लोक में निवास करेंगे. वह चार महीना चतुर्दशी कहलाता है. जो देवशयनी एकादशी से शुरू होकतर देवउठनी एकादशी तक चलता है.

देवी लक्ष्मी ने राजा बलि को जिस दिन रक्षासूत्र बांधा था वह दिन श्रावण महीने की पूर्णिमा का था. यह दिन तभी से रक्षाबंधन के रूप में मनाया जाता है.

2. इंद्र की कथाRaksha Bandhan Ki Kahani

भविष्य पुराण के अनुसार एक बार देवों और असुरों के बीच लगातार 12 वर्षों तक युद्ध होता रहा. इस युद्ध में देवताओं की पराजय के बाद देवराज इंद्र तमाम देवों के साथ अमरावती चले गए. दूसरी तरफ असुरों ने तीनों लोकों पर कब्जा कर लिया. असुरों ने यह घोषणा करवा दी कि इस राज्य में यज्ञ, पूजा, वेदों का पठन-पाठन व धार्मिक कार्यक्रम नहीं होंगे.

ऐसा होने पर तीनों लोकों में धर्म का नाश होने लगा. इससे दुःखी देवराज इंद्र गुरू वृहस्पति के पास गए. उस वक्त गुरू वृहस्पति की पत्नी शुचि भी उनके साथ थी. इंद्र की तकलीफ को देखते हुए उन्होंने कहा कि देवराज कल ब्राह्मण शुक्ल पूर्णिमा है. मैं आपको विधानपूर्वक तैयार किया गया रक्षासूत्र प्रदान करूंगी. उस रक्षासूत्र को कल रक्षाविधान करवाकर आप ब्राह्मणों से अपनी कलाई पर बंधवा लें.

इससे आपकी विजय जरूर होगी. इंद्र ने ब्राह्मण शुक्ल की सुबह शुचि द्वारा मिला रक्षासूत्र ब्राह्मणों द्वारा अपनी कलाई पर बंधवा ली. इस रक्षा सूत्र के प्रभाव से युद्ध में देवताओं की विजय हुई. तभी से यह त्योहार ब्राह्मणों द्वारा भी मनाया जाता है.

3. भगवान श्रीकृष्णा व द्रौपदी की कथाRaksha Bandhan Ki Kahani

इस कथा का संबंध महाभारत काल से है. युधिष्ठिर ने अपनी राजधानी इंद्रप्रस्थ में राजसूय यज्ञ का आयोजन किया था. इस विशाल यज्ञ में शिशुपाल भी शामिल हुआ था. इस दौरान शिशुपाल ने भगवान श्रीकृष्ण का अपमान कर दिया. गुस्से में श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का सुदर्शन चक्र से वध कर दिया. वध करके लौटते समय श्रीकृष्ण की उंगली सुदर्शन चक्र से कट गई. तभी द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनकी उंगली कटी उंगली को बांधी.

तभी श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को इस वस्त्र के एक-एक धागे का ऋण चुकाने का वचन दिया. कौरवों द्वारा द्रौपदी के चीरहरण की कोशिश के दौरान श्रीकृष्ण ने अपना वचन निभाते हुए चीर बढ़ाकर द्रौपदी की लाज बचाई थी. द्रौपदी ने जिस दिन श्रीकृष्ण की उंगली में अपना पल्लू बांधा था वह दिव श्रावण पूर्णिमा का था. इसीलिए इस दिन रक्षाबंधन मनाया जाता है.  

4. युधिष्ठिर की कथाRaksha Bandhan Ki Kahani

महाभारत युद्ध के समय एक दिन युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा था कि मुझे कोई उपाय बताइए, जिससे मैं सभी संकटों को पार पा सकूं. तभी श्रीकृष्ण ने कहा कि सभी सैनिकों की कलाई पर रक्षासूत्र बांध दो. ये सैनिक समस्त संकट हरकर विजय सुनिश्चित करेंगे. युधिष्ठिर के ऐसा ही करने पर उसने महाभारत युद्ध में विजय हासिल की. इस जीत में भी रक्षासूत्र का महत्वपूर्ण योगदान था. युधिष्ठिर ने जिस दिन सैनिकों को रक्षासूत्र बांधा था वो दिन श्रावण मास की पूर्णिमा का था. उसी समय से इस दिन सैनिकों को भी राखी बांधी जाती है.

ऐतिहासिक कहानीRaksha Bandhan Ka Itihas

1. रानी कर्णवती और हुमायूं की कहानीRaksha Bandhan History

राजस्थान में सदियों पुरानी एक प्रथा थी कि राजपूत राजा के युद्ध पर जाते समय महिलाएं उनके माथे पर कुमकुम का तिलक लगाती थी. साथ ही कलाई पर रक्षासूत्र भी बांधती थी. इनका विश्वास था कि रेशम के इस धागे से उन्हें युद्ध में विजय जरूर मिलेगी. साल 1534 में गुजरात के शासक बहादुर शाह जफर ने चित्तौड़ पर हमला कर दिया था. उस वक्त चित्तौड़ की विधवा रानी कर्णवती ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर उनसे सहायता की अपील की थी.

हुमायूं बंगाल पर चढ़ाई के लिए निकल पड़े थे लेकिन राखी मिलते ही उन्होंने अपना बंगाल अभियान रद्द कर रानी कर्णवती की सहायता के लिए चित्तौड़ आ गए. हुमायूं जब चित्तौड़ पहुंचे तब तक काफी देर हो चुकी थी. क्यूंकि तब तक रानी कर्णवती ने जौहर कर लिया था. लेकिन राखी का फर्ज अदा करते हुए हुमायूं ने बहादूर शाह जफर से युद्ध किया. युद्ध में बहादूर शाह जफर को हराकर चुत्तौड़ के शासन की बागडोर उन्होंने अपनी मुंहबोली बहन कर्णवती के पुत्र विक्रमादित्य को सौंप दिया था.

2. सिकंदर और राजा पुरू की कहानीRaksha Bandhan History

यूनान का सम्राट सिकंदर विश्वविजय के लिए निकला था. इस दौरान जब वह भारत पहुंचा तो उसका सामना भारत के पुरुवंश के वीर राजा पोरस के साथ हुआ. सिकंदर और पोरस के बीच घमासान लड़ाई हुई. इसमें पोरस की सेना ने सिकंदर की सेना को कड़ी टक्कर दी. सिकंदर की पत्नी रक्षाबंधन पर्व के बारे में जानती थी. पति सिकंदर पर संकट के बादल मंडराते देख उसने पोरस को राखी भेजी.

सिकंदर की पत्नी द्वारा भेजी गई राखी देखकर पोरस बहुत आश्चर्यचकित हुआ, फिर भी उसने राखी के धागों की मान रखी. युद्ध में सिकंदर का घोड़ा पोरस के भाई द्वारा मारा गया. जिसके बाद सिकंदर पोरस के सामने निहत्था खड़ा था. अब पोरस के पास सिकंदर को समाप्त करने का बेहतर अवसर था लेकिन राखी का मान रखते हुए उसने सिकंदर पर वार नहीं किया और उसे छोड़ दिया.

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