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बच्चों के विकास में खेलकूद की भूमिका और उसके प्रकार क्या हैं?

खेलकूद से बच्चों का शारीरिक विकास, सामाजिक विकास, नैतिक विकास, संज्ञानात्मक विकास व संवेगात्मक विकास होता है. Role and types of sports in children's development

खेलना बच्चों के लिए बेहद ही स्वाभाविक क्रिया है. इसे हर उम्र के बच्चे अपने हिसाब से खेलते हैं. विभिन्न प्रकार के खेल बच्चे के सम्पूर्ण विकास में सहायक होते हैं. खेलकूद से बच्चों का शारीरिक विकास, सामाजिक विकास, नैतिक विकास, संज्ञानात्मक विकास व संवेगात्मक विकास होता है. अलग-अलग खेल का अलग लाभ मिलता है, ठीक ऐसे ही हर बच्चे के खेलने की पसंद भी अलग-अलग होती है.

खेलकूद की भूमिका और उसके प्रकार

Role and types of sports in children's development

खेलकूद में भाग लेने से बच्चों की मानसिक क्षमताओं का तेजी से विकास होता है. सबसे पहले तो बच्चा किसी भी वस्तु के साथ संवेदना प्राप्त करने का काम करता है. इसके बाद वह कल्पनाओं को रूप देने वस्तुओं को किसी का प्रतीक रूप में इस्तेमाल करता है. 7-11 वर्ष की उम्र में वह काल्पनिक भूमिकाओं के खेलों (Role and types of sports in children’s development) की तुलना में नियमबद्ध खेलों में अधिक व्यस्त रहता है.

क्या आपने कभी निरीक्षण किया है कि आपका बच्चा कैसे खेलता है! उसे किस प्रकार के खेल पसंद हैं? बच्चों के खेलने के बारे में बहुत सारे सिद्धांत दिए जाते हैं. लेकिन मोटे तौर पर बच्चों के खेल के 5 प्रकार होते हैं. इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि बच्चों के खेल पांच चरणों में विकसित होते हैं. इन चरणों को यहां जरा देख लेते हैं.

1. क्रियात्मक खेल

2. वैयक्तिक खेल और सामूहिक खेल

3. मुक्त और संरचनात्मक खेल

4. बाहरी व भीतरी खेल

5. संवेदी क्रियात्मक और प्रतीकात्मक खेल

1. क्रियात्मक खेल

क्या आपका बच्चा रोजमर्रा की वस्तुओं के साथ खेलने में ही आनंद लेता है, और उचित खिलौनों में उसकी दिलचस्पी कम है? इसे क्रियात्मक प्रक्रिया कहा जाता है. इस खेल में बच्चा किसी प्रॉपर खिलौने का साथ नहीं बल्कि घर में पड़ी किसी भी चीज से खेलना शुरू कर देते हैं. जैसे किचन में पड़े चम्मच या कटोरे उसके बेस्ट फ्रेंड बन जाते हैं. ऐसे बच्चे को विशेष किस्म के खिलौने की जरूरत नहीं पड़ती. वो बस इसी तरह की चीजों से खेलकर आनंद लेते रहते हैं.

2. वैयक्तिक खेल और सामूहिक खेल

आप देखेंगे कि कुछ बच्चे हमेशा अकेला खेलना पसंद करते हैं, तो इसे वैयक्तिक खेल कहते हैं. लेकिन जब बच्चा एक से अधिक बच्चों के साथ खेलने में दिलचस्पी रखता है तो उसे सामूहिक खेल कहते हैं. समूह में खेलते वक्त बच्चे को दूसरों की दृष्टिकोण का ध्यान रखना पड़ता है. साथ ही खेल के नियमों का भी पालन करना पड़ता है.

बच्चे की योग्यताएं उम्र के साथ विकसित होती है. 3-4 साल की उम्र तक बच्चे अकेले खेलना ही पसंद करते हैं. अगर वे ज्यादा बच्चों के साथ खेलते भी हैं तो बस कुछ देर के लिए. इसके बाद फिर से वे अकेले खेलना शुरू कर देते हैं. बच्चे की उम्र बढ़ने के साथ-साथ वे फिर खुद ही अधिक बच्चों के साथ खेलने लगते हैं. ग्रुप में बच्चों के साथ खेलने से इनका सामाजिक कौशल विकसित होता है. इसके विपरीत वैयक्तिक खेल बच्चों को अपनी रूचि के अनुसार खेलने का अवसर देती है. दोनों प्रकार के खेल ही बच्चे के कौशल विकास में सहायता करते हैं.

3. मुक्त और संरचनात्मक खेल

इस खेल में पालनकर्ता लक्ष्यों और उद्देश्यों को ध्यान में रख कर कई क्रियाओं का आयोजन करते हैं. इन क्रियओं में देखा जाए तो बच्चे को पालनकर्ता के अनुदेशों का पालन करना होता है. यहां बच्चे के पास खेल क्रिया को परिवर्तित करने की स्वतंत्रता बिल्कुल भी नहीं होती है. इसमें बच्चे को खेल के नियमों का पालन करना पड़ता है. इसलिए इस खेल को संरचनात्मक खेल कहते हैं. जैसे अगर बच्चा मिट्टी के साथ बिना किसी के हस्तक्षेप के खेल रहा हो तो उसे मुक्त खेल कहते हैं.

वहीं अगर आकृति की संकल्पना समझाने के लिए जब कोई बच्चे को यह कहता है कि चलों बाहर चलकर मिट्टी के कटोरे और थाली बनाया जाए तब उस खेल को संरचनात्मक कहते हैं. बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए दोनों ही तरह के खेल महत्वपूर्ण हैं. जहां तक मुक्त खेल की बात है तो यह खेल जिज्ञासा और पहल बनाए रखता है. यह बच्चों को खोज करने के लिए प्रोत्साहित करता है.

जबकि संरचनात्मक खेल बच्चे का ध्यान कुछ विशेष पहलुओं की तरफ आकर्षित कर सकता है, जिसके बारे में बच्चे को पहले से कोई जानकारी नहीं होती है. इस तरह देखें तो संरचनात्मक खेल बच्चे को लक्ष्य प्राप्ति में मदद करता है. बच्चे को दोनों ही किस्म के खेल में आनंद आता है. हर किस्म के खेल ही बच्चे को सीखने में मदद करते हैं और बच्चे उससे प्रोत्साहित होते हैं.

4. बाहरी व भीतरी खेल

नाम से ही पता चल रहा है कि खुले मैदान में खेले जाने वाले खेल को बाहरी और कमरे के अंदर खेले जाने वाले खेल को भीतरी खेल कहते हैं. बाहर खेले जाने वाले गेम्स में विभिन्न तरह की क्रियाओं के अवसर मिलते हैं क्यूंकि यहां जगह की कोई कमी नहीं होती. लेकिन कमरे में खेले जाने वाले खेल में स्थान सीमित होता है. इसलिए गतिविधियों की स्वतंत्रता कम होती है.

दोनों प्रकार के खेल की रूप-रेखा लगभग समान होती है. जैसे कई बार बच्चा बाहरी खेल में थोड़ा बदलाव कर उसे घर के अंदर खेल सकता है और भीतरी खेल को भी वह बाहर खेल सकता है. इस तरह खेलने से बच्चे के लिए पुराने खेल भी हमेशा नए जैसे और रूचिकर हो जाते हैं.  

5. संवेदी क्रियात्मक और प्रतीकात्मक खेल

शैशवकाल में बच्चों का वस्तुओं को छूने, सूंघने, चखने जैसी क्रिया भी एक किस्म का खेल है. इस क्रिया में इंद्रियां संलग्न होती है. तभी तो इसे संवेदी क्रियात्मक खेल कहते हैं. थोड़ी उम्र बढ़ने पर बच्चे नाटकीय खेल में भाग लेना शुरू कर देते हैं. इस खेल में बच्चे कल्पना करना आरंभ कर देते हैं. जैसे इस खेल में बच्चे अन्य लोगों की भूमिका निभाते हुए कभी फलवाला, कभी शिक्षक तो कभी फूलवाली बनने का नाटक करते हैं.

इस तरह के खेल में चीजों और लोगों को प्रतीकात्मक रूप में इस्तेमाल करने की ज्ञानात्मक योग्यता की आवश्यकता होती है. इस तरह के खेल को प्रतीकात्मक खेल कहते हैं. संवेदी क्रियात्मक खेल से प्रतीकात्मक खेल तक पहुंचना बच्चों के चिंतन में वृद्धि का परिणाम है.

निष्कर्ष

इस आलेख के माध्यम से हम यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि हर किस्म के खेल बच्चे के विकास में सहायक होते हैं. हर बच्चे के खेल की अपनी-अपनी पसंद होती है कि वह किस प्रकार के खेल में शामिंल होगा. खेल से भी बच्चे के नेचर (Role and types of sports in children’s development) का पता चलता है. शांत बच्चे हमेशा अकेले खेलने वाले खेल पसंद करते हैं. जबकि बाकी बच्चे समूह में खेले जाने वाले खेल के शौकीन होते हैं. बच्चों को विकास में हर खेल ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.  

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