Story Behind Guru Purnima: गुरु पूर्णिमा का महत्व और इससे जुड़ी पौराणिक मान्यताएं

    भारतीय संस्कृति में गुरु को देवता समान माना गया है. गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं. (Story Behind Guru Purnima)

    गुरु पूर्णिमा (Story Behind Guru Purnima) का विशेष पर्व आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है. इस दिन शिष्य अपने गुरू की पूजा कर उन्हें उपहार देते हैं. भारतीय संस्कृति में गुरु को देवता समान माना गया है. गुरु पूर्णिमा का त्योहार पूरे भारत में बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है.

    Guru Purnima

    क्यो मनाया जाता गुरु पूर्णिमा पर्वStory Behind Guru Purnima

    प्राचीन काल में विद्यार्थी जब गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करते थे, तो श्रद्धाभाव से प्रेरित होकर इसी दिन अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा देकर कृतार्थ होता था. घर-परिवार में जो भी अपने से बड़े हैं उसे गुरुतुल्य ही समझना चाहिए. जैसे माता, पिता, बड़ा भाई, बड़ी बहन आदि.

    इस दिन (Story Behind Guru Purnima) स्नान और पूजा आदि से निवृत्त होकर गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए. गुरु का आशीर्वाद ही इंसान के लिए कल्याणकारी व मंगल करने वाला होता है. गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं और इस दिन को चारों वेदों के रचयिता और महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना करने वाले वेद व्यास की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है.

    गुरु पूर्णिमा पर्व से जुड़ी परंपराएं व मान्यताएं

    मान्यता है कि इस दिन से चार महीने तक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं. मौसम की दृष्टि से ये चार महीने सर्वश्रेष्ठ होते हैं. इन दिनों में न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी होती है. इसलिए ये महीने अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं.

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    इसी दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है. वेद व्यास संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और वेदों के सार ब्रह्मसूत्र की रचना भी वेद व्यास ने आज ही के दिन की थी. इन्होंने ही वेद ऋचाओं का संकलन कर वेदों को 4 भागों में बांटा था. इन्होंने ही महाभारत, 18 पुराणों व 18 उप पुराणों की रचना की थी जिनमें भागवत पुराण ग्रंथ भी शामिल है. ऐसे जगत गुरु के जन्म दिवस के अवसर पर गुरु पूर्णिमा मनाने की परंपरा है.

    गुरु पर्व का महत्वStory Behind Guru Purnima

    सदियों से चले आ रहे इस पर्व का आज भी बहुत महत्व है. पारंपरिक रूप से विद्यालयों में यह दिन गुरु को सम्मानित करने का होता है. इस दिन मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे का आयोजन होता है और मेले लगते हैं. इस दिन विद्यार्थियों को अपने गुरु आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए. इस दिन न सिर्फ गुरु (Story Behind Guru Purnima) बल्कि माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है.

    गुरु पूर्णिमा की कथाStory Behind Guru Purnima

    पौराणिक मान्यता है कि वेदव्यास भगवान विष्णु के अंश स्वरूप कलावतार हैं. इनके पिता का नाम ऋषि पराशर व माता का नाम सत्यवती था. वेद ऋषि को बाल्यकाल से ही अध्यात्म में बहुत ज्यादा रुचि थी. इसके फलस्वरूप इन्होंने अपने माता-पिता से प्रभु दर्शन की इच्छा प्रकट कर वन में जाकर तपस्या करने की अनुमति मांगी. लेकिन उनकी माता ने वेद ऋषि की इच्छा को ठुकरा दिया.

    तब इन्होंने जिद ठान ली, जिसके बाद माता ने वन जाने की आज्ञा दे दी. लेकिन जाते वक्त वेद व्यास की माता ने उनसे कहा कि जब गृह का स्मरण आए तो लौट आना. इसके बाद वेदव्यास तपस्या करने के लिए वन चले गए और वन में जाकर कठिन तपस्या की. इसके पुण्य प्रताप से ही उन्हें संस्कृत भाषा में प्रवीणता हासिल हुई.

    इसके बाद ही वेद व्यास ने वेदों का विस्तार किया और महाभारत, अठारह महापुराणों सहित ब्रह्मसूत्र की भी रचना की. इन्हें बादरायण भी कहते है. वेदव्यास को अमरता का वरदान प्राप्त हुआ था यानि वे आज भी किसी न किसी रूप में हमारे बीच उपस्थित हैं.

    गुरु पूर्णिमा पूजा विधिStory Behind Guru Purnima

    इस दिन प्रातः उठकर गंगाजल युक्त पानी से स्नान ध्यान करें. फिर स्वच्छ वस्त्र धारण करें. घर में पूजा स्थान पर व्यास-पीठ बनाकर निम्न मंत्रों से गुरु का आह्वान करें.

    ”गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये”

    गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

    गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

    अब गुरु की तस्वीर रख कर जल, फल, फूल, दूर्वा, अक्षत, धूप-दीप आदि से उनकी पूजा करें. अंत में आरती कर उनके पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करें. यह व्रत सूर्योदय के बाद और चंन्द्र उदय तक ही किया जाता है.

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