आखिर विक्रम साराभाई को क्यों कहते हैं ‘अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक’!

    भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई उंचाई देने वाले वैज्ञनाकि साराभाई थे. इन्हें भारतीय वैज्ञनिक क्षेत्र की रीढ़ भी कहा जा सकता है. Vikram Sarabhai Birthday

    वैज्ञानिकों का महत्व तो सदा ही रहा है चाहे वो किसी भी देश के हों. क्योंकि किसी भी देश के विकास में वैज्ञानिकों का योगदान सबसे अहम है. इनके कार्यों से देश को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है.

    Vikram-Sarabhai

    भारत में वैसे तो कई वैज्ञानिक हुए हैं. उनमें एक थे डा. विक्रम अंबालाल साराभाई. इन्हें विक्रम साराभाई के नाम से भी जाना जाता है. इन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक माना जाता है. उन्हें भारत के दो सम्मानित पुरस्कार पद्म भूषण (1966) और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था.

    इन्होंने ही भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को दिशा दी थी.साराभाई को एक अच्छा लीडर भी माना जाता है. पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम आजाद ने साराभाई के नेतृत्व में ही अंतरिक्ष विज्ञान में अपने करियर की शुरुआत की थी.

    साराभाई ने इसरो के पूर्व अध्यक्ष के. कस्तूरी रंगन से लेकर वरिष्ठ वैज्ञानिकों की एक पीढ़ी को तैयार किया था. जिसे भारतीय वैज्ञानिक क्षेत्र की रीढ़ कह सकते हैं. इनका जन्म 12 अगस्त 1919 में हुआ था.

    महान लोगों की विचारधाराओं से थे प्रभावित –

    वे रवींद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे दिग्गजों की विचारधारा से वे प्रभावित रहे. कार्यों को देखकर इन्हें भी भारतीय पुनर्जागरण काल का प्रतिनिधि मान सकते हैं.

    परमाणु वैज्ञानिक डॉ होमी जहांगीर भाभा की सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहुत प्रतिष्ठा थी. जिस तरह साराभाई ने कलाम को पहचाना था, ठीक उसी तरह जहांगीर भाभा ने भी साराभाई की प्रतिभा को पहचाना था.

    भाभा ने बैंग्लोर के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएस) में अध्ययन व शोध करना शुरू किया. साराभाई की भाभा से मुलाकात यहीं हुई थी. इनके अध्ययन क्षेत्रों के मुताबिक दोनों मेधावी वैज्ञानिकों की मुलाकात मानों दो विपरीत दिशा की मुलाकात हो.

    भाभा की दिलचस्पी अणु विज्ञान में थी तो वहीं साराभाई की दिलचस्पी अंतरिक्ष में विज्ञान था. वर्ष 1947 में साराभाई ने अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) स्थापित किया था.

    भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला स्थापित करने को पिता से लिए थे रुपये –

    तब उनकी उम्र मात्र 28 वर्ष थी. लेकिन कुछ ही वर्षों में उन्होंने इस प्रयोगशाला को विश्वस्तरीय संस्थान बना दिया था. इसके बाद भारत सरकार से उसे मदद मिलना शुरू हो गया था. हालांकि इस संस्थान को शुरू करने के लिए उन्हें अपने उद्योगपति पिता से रुपये लेने पड़े थे.

    पीआरएल अंतरिक्ष विज्ञान से संबंधित संस्था है. इस संस्था की स्थापना व संचालन करने के दौरान मिले अनुभव की वजह से वे एक कुशल प्रबंधक भी बन गए. बाद में साराभाई ने अपने पारिवारिक बिजनेस की तरफ रूख किया.

    गुजरात के साथ-साथ देश के कई हिस्सों में उन्होंने अपने बिजनेस का विस्तार किया. इस कड़ी में उन्होंने साराभाई केमिकल्स, साराभाई ग्लास, सेमिबायोटिक्स लिमिटेड, साराभाई इंजीनियरिंग ग्रुप की स्थापना के साथ-साथ इन्हें काफी उंचाइयां भी प्रदान की थी.

    इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (अहमदाबाद) की स्थापना साराभाई ने की थी. इन तमाम कार्यों के बाद भी उनका मन अंतरिक्ष विज्ञान में ही लगता था. साराभाई के नतृत्व में ही वर्ष 1963 में पहला प्रायोगित रॉकेट छोड़ा गया था.

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    पहले रॉकेट का परीक्षण थुंबा से किया था –

    इसके परीक्षण के लिए केरल के थुंबा को चुना गया था. भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत में वैज्ञानिक भाभा का उन्हें भरपूर सहयोग मिला था. इस रॉकेट का निर्माण अमेरिका में किया गया था. इसके बाद साराभाई चाहते थे कि यहां से भारत निर्मित रॉकेट को छोड़ा जाए.

    उनके लिए भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान का विकास सीधे-सीधे सामाजिक विकास से जुड़ा था. साराभाई का मानना था कि देश व समाज की समस्याओं का समाधान करने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग करना चाहिए.

    इनका कहना था कि टेलीविजन भारत के ग्रामीण क्षेत्र के विकास व देश के एकीकरण में अहम भूमिका अदा कर सकता है. टेलीविजन के प्रसारण के लिए संचार संचार सेटेलाइटों का उपयोग करना चाहता है.

    साल 1966 में होमी साराभाई की प्लेन क्रैश होने से मौत हो गई थी. अपना सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक खोने के बाद देश की उम्मीदें साराभाई से बढ़ गई थी. अंत में नवंबर 1967 में भारत निर्मित पहला रॉकेट थुंबा से छोड़ा गया था.

    1969 में इसरो का हुआ था निर्माण –

    वर्ष 1969 में इनस्कॉपर को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन या इसरो बनाया गया. जिसके पहले अध्यक्ष साराभाई थे. भारत को संचार उपग्रह के क्षेत्र में लाने के पीछे डॉ साराभाई की दूरदृष्टि कारगर हुई थी.

    टेलीविजन प्रसारण में साराभाई की महत्वपूर्ण भूमिका थी. भारत में टेलीविजन प्रसारण की औपचारिक शुरुआत 1959 से मानी जाती है. इसका पहला परीक्षण व सामान्य प्रसारण दोनो दिल्ली में ही हुआ था. साल 1975 तक देश के सात शहरों में टीवी पहुंच चुकी थी.

    30 दिसंबर 1971 के साराभाई की मौत हो गई थी. डॉ भाभा की तरह इनकी मौत पर भी संदेह जताया जा रहा है. हालांकि उनकी मृत्यु के बाद भी उनका सपना पूरा हुआ. यही वजह है कि आज भारत अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में अन्य विकसित देशों के साथ खड़ा है.

    विक्रम साराभाई ने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई दिशा प्रदान की थी. अंतरिक्ष जगत से जुड़ी यह जानकारी आप तक पहुंचे इसलिए हमने इसे आपके साथ साझा किया है. इस आलेख पर अपनी प्रतिक्रया ‘योदादी’ पर अवश्य साझा करें. #VikramSarabhai

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